शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

१७. बिरहनी उलाहने को अंग ~ ३

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
.
*१७. बिरहनी उलाहने को अंग* 
.
*मोसौं कहै और सी ही, वासौं कहै और सी ही,*
*जासौं कहै ताहि के प्रतीति कैसें होत है ।* 
*काहू कौ संभास करै, काहू सौं उदास फिरै,* 
*काहू सौं तौ रस बस एकमेक पोत है ॥* 
*दगाबाजी दुबिध्या तौ मन की न दूरि होइ,* 
*काहू कै अंधेरौ घर, काहू कै उदोत है ।* 
*सुन्दर कहत जाकै पीर सौ करै पुकार,* 
*जाकै दुख दूरि गयौ ताके भई वोत है ॥३॥* 
मुझ से वे अन्य बात कहते हैं, उससे कुछ अन्य बात कहते हैं । हम यहाँ यही सोचते हैं कि वे जिससे जो बात कहते हैं उस पर उस सुनने वाले को भी विश्वास होता है कि नहीं ! 
कभी किसी से वे घुलमिल कर बात करते हैं, फिर किसी से उदास हुए रहते है, कभी किसी के स्नेह में अत्यधिक आसक्त होकर उससे एकाकार से हुए रहते हैं । 
उनकी धोखा देने की प्रवत्ति उनके मन से दूर नहीं हुई है ! अतः उनने अपने क्रियाकलाप से किसी घर में अन्धकार कर दिया है तो किसी घर में प्रकास फैला दिया है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - जिसके मन में पीड़ा हो वह भले ही पुकार करता रहे; परन्तु, उनके साथ रहने के कारण, जिस का दुःख क्षीण हो गया है उस के घर में तो सुख शान्ति हो ही गयी ॥३॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें