मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९०. परिचय । पंचम ताल ~
नीको धन हरि कर मैं जान्यौं, 
मेरे अखई वोही ।
आगे पीछै सोई है रे, 
और न दूजा कोई ॥टेक॥
कबहुँ न छाड़ूँ संग पिया को, 
हरि के दर्शन मोही ।
भाग हमारे जो हौं पाऊँ, 
शरणैं आयो तोही ॥१॥
आनन्द भयो सखी जिय मेरे, 
चरण कमल को जोई ।
दादू हरि को बावरो, 
बहुरि वियोग न होई ॥२॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, परमेश्‍वर के साक्षात्कार का परिचय दे रहे हैं कि हमने विचारपूर्वक अन्तःकरण में देखा है कि हरि का नाम - स्मरण रूपी धन ही अति श्रेष्ठ है । हमारी आँखों के सामने तो अब हरि का दर्शन रूपी धन ही, सदैव रहता है । इस सृष्टि के आदि में और अन्त में, वह हरि ही शेष रहते हैं । माया और माया का कार्य, सब परिवर्तनशील है ।
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अब हम ऐसे प्रीतम का कभी भी संग नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि उस प्रभु का हमें सदैव दर्शन हो रहा है । हे नाथ ! हमारे जन्म - जन्मान्तरों का पुण्य अबके उदय हुआ है जो हमने आपकी शरण में आकर आपको पाया है ।
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हे संतों ! अब हमारे अन्तःकरण में प्रीतम के चरणों का दर्शन करके आनन्द हो रहा है । हे प्रभु ! हम तो आपके बावरे भक्त हैं । हमारा आपसे अब कभी भी वियोग न होवे, ऐसी कृपा करना ।
(क्रमशः)

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