रविवार, 4 जनवरी 2015

= ८७ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
साधु सदा संयम रहै, मैला कदे न होइ ।
दादू पंक परसै नहीं, कर्म न लागै कोइ ॥
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Reading for ever ~
भारत का एक शाश्वत प्रश्न है जिसका उत्तर पुरातन काल से ढूंढा जा रहा है, और ढूंढा जाता रहेगा . प्रश्न है कि मैं कौन हूँ, मैं कहाँ से आया हूँ और कहाँ मुझे जाना है ? जिन्हें इस प्रश्न का उत्तर मिल गया वे जन्म और मृत्यु के 84 के चक्र से आजाद हो गए . 
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एक घटना का ज़िक्र कर रहा हूँ . घटना मैथिलीशरण गुप्त जी के जीवन की है . मैथिलीशरण जी को एक बार दार्जलिंग जाना पड़ा . वे जहाँ ठहरे थे, उनके बगल में ही एक अंग्रेज़ अफसर ठहरा हुआ था . उससे जान पहचान हुई और आना जाना शुरू हुआ . एक दिन मैथिलि जी ने उस अंग्रेज़ से भारत और भारतियों के बारे में जानना चाहा . 
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उसने जवाब दिया कि जो सुना था उस से कहीं अधिक और कहीं आगे है भारत . उसने एक घटना का ज़िक्र किया जो उसके साथ घटी थी . उसने बताया कि उसके साथ उस बंगले मैं दो व्यक्ति और भी थे, एक रसोइया और एक माली . उसने बताया कि जो माली था उसके चेहरे पर शांति साफ़ झलकती थी . अपनी बात को आगे बढाते हुए उसने बताया कि माली उम्र में काफी बड़ा था यानि कि बुज़ुर्ग था . अपने काम को समय पर निपटा देता और शिकायत का कोई मौका नहीं देता था . 
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उसने कभी मांग नहीं रखी, जो कहा जाता पूरी तल्लीनता से करता था . एक दिन मै गेट के पास गया, वह वहीँ खड़ा था . न जाने मेरे मन में क्या आया, मैंने उसके काम में गल्तियां निकालनी शुरू कर दी .वह शांति से सुनता रहा . मेरी बात पूरी होने पर उसने सिर्फ इतना ही कहा कि आगे से ऐसा नहीं होगा . उसके इस उत्तर ने मुझे बड़ी परेशानी में डाल दिया, उस अंग्रेज़ ने बताया कि "मैं उसे अपने सामने झुकाना चाहता था, पर मेरी दाल नहीं गली . मैंने उसकी गलती पर गलती निकालनी शुरू दी, पर सब कुछ शांति से सुनता रहता . और मैं अन्दर ही अन्दर कुढ़ता रहता . 
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एक बार दिसम्बर मास चल रहा था, मेरे मन मैं शैतानी सूझी, उस माली के पास एक ही कम्बल था, चूँकि मैं उसे अपने सामने झुकाना चाहता था इस लिए मेरे मन का शैतान जाग उठा . दोपहर के वक़्त मैंने रसोइये द्वारा उसका कम्बल उठवा दिया . मैं सोच रहा था कि अब वो झुकने को मजबूर होगा, हाथ जोड़ कर पूछेगा कि कम्बल कही देखा हो ?" मैंने रसोइये की ड्यूटी लगा दी कि वह ध्यान रखे, कि क्या हो रहा है . शाम का समय हो गया और रसोइया मेरे कहे अनुसार उसके पास गया . उस वक़्त माली अपना कंबल ढूंढ रहा था . उसे कंबल नहीं मिला . 
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वह अपनी चारपाई पर लेट गया . अपनी धोती को खोल कर अपने ऊपर ओढ़ लिया . रसोइयेने पूछ ही लिया कि 'कंबल क्यूँ नहीं ऊपर ले रहे' ? माली ने उत्तर दिया कि किसी को जरूरत थी वह ले गया . रसोइये ने पुछा 'क्या आपसे पूछ कर ले गया ? माली ने जवाब दिया "नहीं, उसे शायद पूछने में शर्म आ रही होगी, उसे सख्त जरूरत होगी ओर मैं यहाँ था नहीं किस से पूछता ? अब प्रभु को धन्यवाद दे रहा होगा कि प्रभु ने उसकी सुन ली . मैं भी प्रभु का धन्यवादी हूँ, वैसे तो प्रभु को याद करने का मौका मिलता नहीं, उसने मेरे लिए अपनी याद का मौका बना दिया . अब सारी रात प्रभु सुमिरन में गुजरेगी ." रसोइये ने आकर मुझे सारी बात बता दी . 
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उसके इस जवाब से मुझे झटका लगा पर मेरे मन का शैतान शांत नहीं हुआ . उस वक़्त तो मैंने रसोइये द्वारा कंबल भिजवा दिया . रसोइये ने जाकर उसे कंबल देते हुए कहा , "आपकी कुटिया की बगल में रखा हुआ था ." इस पर माली ने जवाब दिया कि "मेरी नज़र नहीं पड़ी होगी, अब नज़र भी कमज़ोर हो गयी है" इस पर रसोइया वापिस आकर अपने स्थान पर सोने चला गया". और मैं सारी रात सो नहीं सका . अगले दिन कोई त्यौहार था सुबहे से ही मंदिर से कीर्तन आदि की आवाज़ आ रही थी . सांझ के समय माली मेरे पास आया और मंदिर जाने की आज्ञा मांगने लगा . 
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अब मेरे मन का शैतान फिर उठ खड़ा हुआ ." मैंने उसे मंदिर जाने की आज्ञा नहीं दी . पहली बार मैंने उसके चेहरे पर वेदना, दुःख देखा जो कि साफ़ झलक रहा था . उसने कोई जवाब नहीं दिया, मैं सोच रहा था की आज तो हाथ जरूर जोड़ेगा पर वह चुपचाप बाहर निकल गया . वह अभी बाहर निकला ही था कि जोरदार धमाका हुआ, मैं घबरा गया, बाहर निकला तो देखा कि माली धरती पर गिरा हुआ था उसका सिर फट चुका था, और प्राण निकल चुके थे . रसोइया भी आ गया, उसने उसे देखते ही कहा कि उसका ब्रह्माण्ड फट गया है . मैंने इसका मतलब पूछा तो उसने जवाब दिया" ऐसी मृत्यु साधु संतों की होती है, जब आत्मा सिर के रास्ते बाहर निकलती है .
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[पाठकों को याद होगा कि देवरहा बाबा की मृत्यु अभी कुछ बरस पहले ऐसे ही हुई थी] उस अंग्रेज़ ने कहा "मेरा सिर श्रधा से झुक गया . मैं दुखी हुआ, पर तब कुछ हो नहीं सकता था . उस दिन मुझे समझ आया कि वह प्रभु का प्यारा था . उसके चेहरे की शांति मुझे हमेशा याद आती है". "उस दिन से मन ने यह माना कि भारत को क्यों जगत का गुरु कहा जाता है . आइये अब वहां चलते हैं जहाँ से शुरू किया था कि एक शाश्वत प्रश्न, कि हम यहाँ क्यूँ हैं हम कहाँ से आये और कहाँ हमें जाना है ? इस प्रश्न का उत्तर जिन्हें मिल गया वह भवसागर पार हो गए, वे ही संत कहलाये और जो इन संतो की शरण में चले गये वे भी चौरासी के चक्र से आजाद हो गए . इसी लिए कहा गया है की संत न होते जगत में तो जल मरता संसार . धन्यवाद .

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