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@Mahant Ramgopal Das Tapasvi ~ * काल चितावनी कौ अंग *
काल ग्रसत हे बावरे, चेतन क्यौ न अजांन ।
सुन्दर काया कोट मै, होइ रह्या सुलतांन ॥ 1 ॥
टीका:---अरे अग्यानी पुरूष ! तेरी मृत्यु तुझे ग्रास(भोजन) बनाने की सोच रही है, तूं सावघान क्यों नही होता । तूं अपने शरीररूप दुर्बल किले में बैठा हुआ स्वंय को बहुत बलशाली राजा मान रहा है ।
॥ सत्य राम ॥
सुन्दर काल महाबली, मारे मोटे मीर ।
तूं कौनैं की गिनति में, चेतत काहि न बीर ॥ 2 ॥
टीका :- अरे ! यह मृत्यु अतिशय बलशाली है । इसने बड़े बड़े राजा महाराजाओं को मार गिराया है । तब तुझ दुर्बल प्राणी को उस के सामने क्या स्तिति हैं । अत: मेरे भाई ! तूं अब भी सावधान होजा ।
॥ सत्य राम सा ॥
सुन्दर काल गिराइ दे,एक पलक में आइ ।
तं क्यौं निर्भय हेव् रह्यौ, देखि चाल्यौ जग जाइ ॥ 3 ॥
टीका:---- महात्मा श्री सुन्दरदासजीकहते है कि ---- वह मृत्यु एक क्षण में यहॉ आकर तुझ को मार गिरायगा । तूं निश्चन्त(निर्भय) हेाकर क्यो बैठाहै ! तू देख नही रहा केउस के मारे हुए संसार के प्राणी तेरी आंखो के सामने(दूसरी योनियों से) जा रहे हैं ।
॥ सत्यराम सा ॥
सुन्दर चितावै और कछु , काल सु चितवै और ।
तूं कहुं जाने की करै ,वहु मारै इहिं ठौर ॥ 4 ॥
टीका :---अरे अग्य प्राणी ! तूं कुछ अन्य प्रकार सै ही विचार कर रहा है, तथा तेरी मृत्यु का चिंतन कुछ दूसरा है । तूं अपनी किसी लम्बी योजना की पूर्ती के लिये कही जाने की योजना बना रहा है, परन्तु तेरी मृत्यु तुझे इसी समय यही मारनेकी सोच रही है ।
॥ सत्यराम सा ॥
अरधंत कवल उरधंत मध्ये, प्राणपुरिष का बासा ।
व्दादस हंसा उलटि चलेगा, तब हीं जोति प्रकासा ॥
टीका:--- मूलाधार और सहस्त्रार में स्थित कमलों के बीच प्राण -पुरूष की अवस्थितति का साक्षात्कार हो जाने पर बहिर्गामी प्राण भीतर ही रममाण हो जाता है, और तब उस दिव्य ज्योति का दीदार होता है, जिसके लिए योगी साधक प्रयासरत रहता है ।
( श्री गोरख वाणी ) ॥ सत्य राम सा ॥

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