शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

१९. सूरातन को अंग ~ २

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१९. सूरातन को अंग* 
*हाथ मैं गह्यौ है खग्ग, मरिबे कौं एक पग,*
*तन मन आपनौ समरपन कीनौं है ।* 
*आगै करि मीच कौ पर्यो है डाकि रन बीच,* 
*टूक टूक होइ कै भगाइ दल दिनौं है ॥* 
*खाइ लौंन श्यामं कौ हरांमखोर कैसें होइ,* 
*नांमजाद जगत में जीत्यौ पन तीनौं है ।* 
*सुन्दर कहत ऐसौ कोऊ एक सूरवीर,* 
*शीश कौं उतारिकैं सुजस जाइ लीनौं है ॥२॥* 
वह वीर हाथ में खड्ग(तलवार) लेकर मृत्यु के सम्मुख एक एक पद आगे बढ़ता हुआ उस युद्ध में अपना तन मन सर्वथा अर्पित कर देता है ।
वह मृत्यु को सामने रख कर, युद्ध में कूद पड़ता है । स्वयं क्षत विक्षत होकर भी शत्रु दल को परास्त करके पीछे लौटता है । 
वह प्रभु परमात्मा का नमक खा कर नमकहराम कैसे हो सकता है । उसने जगत् में प्रसिद्ध होकर अपनी तीनों अवस्थाएँ - बाल, युवा एवं वृद्ध - जीत ली है, सफल करली है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसा विरला ही होता है जो वीरता से युद्ध करता हुआ अनुपम यश प्राप्त कर ले ॥२॥
(क्रमशः)

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