शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

= ७९ =

卐 सत्यराम सा 卐
दादू चारै चित दिया, चिन्तामणि को भूल ।
जन्म अमोलक जात है, बैठे माँझी फूल ॥
भरी अधौड़ी भावठी, बैठा पेट फुलाइ ।
दादू शूकर स्वान ज्यों, ज्यों आवै त्यों खाइ ॥
दादू खाटा मीठा खाइ करि, स्वादैं चित दीया ।
इन में जीव विलंबिया, हरि नाम न लीया ॥
भक्ति न जाणै राम की, इन्द्री के आधीन ।
दादू बँध्या स्वाद सौं, ताथैं नाम न लीन ॥
राम रसायन भर भर पीवै,
दादू जोगी जुग जुग जीवै ।
संयम सदा, न व्यापै व्याधी,
रहै निरोगी लगै समाधी ॥
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@Gautam Chauhan ~
॥ यौवन सुरक्षा ॥
शरीरमाधं खलु धर्मसाधनम् ।
यदि शरीर धर्म का साधन है । इसीसे सारी साधनाएँ सम्पन्ऩ होती हैँ । यदि शरीर कमजोर है तो मन भी कमजोर पङ जाता है । कोई भी कार्य सफलतापूर्वक करना हो तो तन-मन दोनोँ स्वस्थ होने चाहिए ।
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जिन्होँने विषय-विकारोँ मेँ अपनी नाड़ीशक्ति कमजोर कर दी है, अपने ओज-तेज को नष्ट कर दिया है वे साधना की हिम्मत नहीँ जुटा पाते किँतु शरीर कमजोर होने पर भी जो विकारोँ मेँ नहीँ गिरते उनका मन सेवा-साधना से पुष्ट होते है । साधना करने की क्षमता होते हुए भी युवावर्ग संसार की चकाचौँध से प्रभावित हो विकारी सुखोँ मेँ अपना ओज-तेज बिखेर के हताशा, निराशा, विफलता व खिन्ऩता का शिकार हो जाता है ।
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अपनी वीर्यशक्ति का महत्व न समझने के कारण बुरी आदतोँ मेँ पड़कर उसे खर्च कर देता है, फिर जिँदगी भर पछताता रहता है । ऐसे युवक किसीको अपना दु:ख-दर्द नहीँ सुना पाते । अब मन और शरीर कमजोर हो गये, संसार उनके लिए दु:खालय हो गये, ईश्वरप्राप्ति उनके लिए असंभव हो गये । अब संसार मेँ रोते-रोते जीवन घसीटना ही रहा ।
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इसीलिए हर युग मेँ महापुरुष ब्रहाचर्य पर जोर देते आये हैं । जिस व्यक्ति के जीवन मेँ संयम नहीँ है, वह न तो स्वयं की ठीक-से उन्ऩति कर पाता है और न ही समाज मेँ कोई महान कार्य कर पाता है । ऐसे व्यक्तियोँ से बना हुआ समाज और देश भी सच्ची सुख-शांति व आध्यात्मिक उन्ऩति मेँ पिछड़ जाता है 

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