॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१८. शब्दसार को अंग*
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*भौंन उहै भय नाहिं न जा महिं,*
*गौंन उहै फिर होइ न गौंना ।*
*बौंन उहै बमिये विषया रस,*
*रौंन उहै प्रभु सौं नित रौंना ॥*
*मौंन उहै जु लिये हरि बोलत,*
*लौंन उहै सब और अलौंना ।*
*सौंन उहै गुरु संत मिलै जब,*
*सुन्दर शंक रहै नहिं कौंना ॥५॥*
'भवन' उसे ही मानना चाहिये जिसमें वास करने पर किसी प्रकार का भय न प्रतीत हो । 'गमन' तभी वास्तविक होता है जब फिर कभी न जाना पड़े ।
'वमन' उसे कहना चाहिये जो विषयवासनाओं की उल्टी कर दे । 'रुदन'(रोना) वही मानना चाहिये जो प्रभु दर्शन के लिये किया जाये ।
'मौन' उसे मानना चाहिये जिसमें हरीभजन होता रहे । 'लवण' उसे कहना चाहिये जिस को खाने के बाद अन्य सब रस लवणरहित लगें ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - 'शकुन'(सौंन) उसे कहना चाहिये जिसके होने के बाद गुरु एवं सन्तों के दर्शन में निश्चयता आ जाय । तथा किसी भी कोण से उस दर्शन में शंका न रह जाय ॥५॥
(क्रमशः)

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