शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

१८. शब्दसार को अंग ~ ५


॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१८. शब्दसार को अंग* 
*भौंन उहै भय नाहिं न जा महिं,* 
*गौंन उहै फिर होइ न गौंना ।* 
*बौंन उहै बमिये विषया रस,* 
*रौंन उहै प्रभु सौं नित रौंना ॥* 
*मौंन उहै जु लिये हरि बोलत,* 
*लौंन उहै सब और अलौंना ।* 
*सौंन उहै गुरु संत मिलै जब,* 
*सुन्दर शंक रहै नहिं कौंना ॥५॥* 
'भवन' उसे ही मानना चाहिये जिसमें वास करने पर किसी प्रकार का भय न प्रतीत हो । 'गमन' तभी वास्तविक होता है जब फिर कभी न जाना पड़े । 
'वमन' उसे कहना चाहिये जो विषयवासनाओं की उल्टी कर दे । 'रुदन'(रोना) वही मानना चाहिये जो प्रभु दर्शन के लिये किया जाये । 
'मौन' उसे मानना चाहिये जिसमें हरीभजन होता रहे । 'लवण' उसे कहना चाहिये जिस को खाने के बाद अन्य सब रस लवणरहित लगें । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - 'शकुन'(सौंन) उसे कहना चाहिये जिसके होने के बाद गुरु एवं सन्तों के दर्शन में निश्चयता आ जाय । तथा किसी भी कोण से उस दर्शन में शंका न रह जाय ॥५॥ 
(क्रमशः)

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