शनिवार, 10 जनवरी 2015

#daduji 

सुन्दर सद्गुरु यों कहें, भ्रम ते भासे और |
सीपि मांहि रूपौ द्रसे, सर्प रज्जु की ठौर ॥
रज्जु मांहि जैसे सर्प भासे,सीपि में रूपौ यथा |
मृग तृष्णा का जल बुद्धि देखे, विश्व मिथ्या है तथा ॥
जिनि लह्यो बमह्म अखंड पद, अद्वैत सब ही ठाम हैं |
दादूदयालु प्रसिद्ध सद्गुरु, ताहि मोर प्रणाम हैं ॥ 
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योगवाशिष्ठ महारामायण ~
चैतन्य में जो कल्पना हुई है सो संकल्प विकल्परूपी मन होकर स्थित हुआ है । उसके कलपने से देश, काल, नदियाँ; पर्वत, स्थावर और जंगमरूप जगत् हुआ है । जैसे सुषुप्ति से स्वप्न हो वैसे जगत् हुआ है । उसको कोई अविद्या कोई जगत् कोई माया कोई संकल्प और कोई दृश्य कहते हैं; वास्तव में सब ब्रह्मस्वरूप है-और कुछ नहीं । जैसे स्वर्ण से भूषण बनता है तो भूषण स्वर्णरूप है; स्वर्ण से भूषण कोई अलग वस्तु नहीं है वैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं है । भेद तो तब हो जब जगत् उपजा हो;जो उपजा ही नहीं तो भेद कैसे लगे और जो भेद लगता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है - अर्थात् जैसे मृगतृष्णा की नदी के तरंग भासते हैं पर वहाँ सूर्य की किरणें ही जल के समान भासती हैं।

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