शनिवार, 10 जनवरी 2015

दादू निंदक बपुरा जनि मरै, पर उपकारी सोइ ।
हम को करता ऊजला, आपण मैला होइ ॥
दादू निन्दक बुरा न कहिये, पर उपकारी अस कहॉं लहिये ।
ज्यों ज्यों निन्दैं लोग विचारा, त्यों त्यों छीजै रोग हमारा ॥ 
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@बिष्णु देव चंद्रवंशी
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सचमुच विपत्ति में ही मनुष्य के धैर्य और धर्म का पता लगता है; परन्तु यह विश्वास रखिये, जिनका जीवन केवल आराम से ही बीतता है उनके लिए जीवन में पूर्ण विकास और पूर्ण परिणति बहुत कठिन हो जाती है l वे न तो अपने को भलीभांति परख - पहचान सकते हैं और न दूसरे की यथार्थ स्थिति का ही अनुभव कर सकते हैं l इसी से बुद्धिमान लोग विपत्ति से घबराते नहीं l वे जानते हैं कि जो लोग 'हाँ हजूर' कहनेवाले खुशामदियों और तारीफ के पुल बांधनेवाले स्वार्थियों से घिरे रहकर इन्द्रिय सुखभोग के आराम में लगे रहते हैं, वे भगवत्कृपा के परम लाभ से प्राय: वंचित ही रहते हैं l विपत्ति में धीरज न छोड़कर उसे भगवान् के दें मानकर सम्पत्ति के रूप में परिणत कर लेना चाहिए l फिर विपत्ति का दुःख मिटते देर न लगेगी l 
यही बात निन्दा करने वाले भाइयों के सम्बन्ध में समझिये l आप यह माने कि आपकी जितनी भी निन्दा होती है, उतने ही आपके पातक घुलते हैं l निन्दा करनेवाले तो बिना पैसे के धोबी हैं, हमारे अन्दर जरा भी मैल नहीं रहने देना चाहते l हमारे पाप धोने जाकर जो स्वाभाविक ही हमारे पाप का हिस्सा लेने को तैयार हैं, वे क्या हमारे कम उपकारी हैं ? एक तरह से उनका यह त्याग है l आपकी निन्दा होती है, यह वस्तुत: बहुत अच्छा होता है l आप तो भाग्यवान हैं, जो आप को इतने निन्दा करनेवाले मिल जाते हैं l निन्दकों से कभी न तो द्वेष करना चाहिए, न उन्हें रोकना चाहिए और न मन में बदला लेने कि ही कोई भावना करनी चाहिए l हाँ, उनके बतलाये हुए दोषों पर धीरज तथा शान्ति के साथ विचार करना चाहिए और उनमें से एक भी दोष जान पड़े तो उसे दृढ़ता और साहस के साथ दूर करके मन-ही-मन निन्दकों का उपकार मानना चाहिए l भगवान् और धर्म का दृढ सहारा पकडे रखकर साहस तथा धैर्य के साथ विपत्ति का सामना करना चाहिए l भगवान् ने कहा है -

(गीता १८ / ५८)
'मुझ में चित्त लगाने पर तू मेरी कृपा से सारे संकटों से पार हो जायेगा l ' भगवान् के इन वचनों पर विश्वास करके उनमें चित्त लगाना चाहिए

@Ramjibhai Jotaniya via @Sumitra Gupta ~
ॐ आलोचना (CRITICISE),उपेक्षा, निन्दा, भी उत्थान का कारण बन सकतीं है---

अरे ! अरे ! क्या कह रहे हो, आलोचना, उपेक्षा और उत्थान का कारण । इतना बड़ा विरोधाभास।आश्चर्य घोर आश्चर्य। आप सभी सोच रहें होगें, भला कोई आलोचना करे, कोई मीन-मेख निकाले और प्रगति हो,ऐसा कैसे सम्भव हो सकता है ?
पर यह बिल्कुल सत्य है, कि बहत से लोगों ने आलोचना पाकर ही, बुराई पाकर ही, कष्ट पाकर ही, अपने आपको और अधिक श्रेष्ठ, अपने कठिन लक्ष्यों को पाकर पहले से भी और अधिक ऊर्जावन बनाया है। महान सन्त श्री तुलसीदास जी ने तोअपने द्वारा रचित सुप्रसिद्ध ग्रन्थ श्री रामचरितमानस लिखते समय प्रभु,सन्त,सज्जनों की वन्दना के साथ-साथ दुष्ट, आलोचक निन्दक जनों की भी वन्दना की है ---
बहुरि बंदि खल गनसतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें।।
अर्थात्- सन्त तुलसीदासजी कहते हैं कि अब मैं सच्चे ह्रदय से,सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वालों के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है,जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में बिषाद होता है। और भी--
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।।
अर्थात् -- मैं दुष्टो को (हजार मुख वाले)शेषजी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं। अब मैं आपको उन लोगों के विषय में बताना चाहूँगी, जिन्होंने आलोचनाओं, उपेक्षाओं के बाद भी बहुत कुछ पाया, यँहा तक की प्रभु दर्शन भी पाया, अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से परमात्मा को भी खम्भे से प्रगट करवा दिया। 
हम सभी उन नामों से भली-भाँति परिचित हैं, वे हैं ध्रुव जिनको उनकी सौतेली माँ ने उपेक्षित किया था, और फिर उस पाँच वर्ष के बालक ने कठिन तप करके चक्रसुदर्शनधारी भगवान विष्णु का दर्शन पाया और बाद में सबसे पहले सौतेली माँ को ही प्रणाम किया। 
प्रह्लादजी के तो पिता ही कारण थे। कण-कण में बसने वाले प्रभु खम्भे से ही प्रगट हो गये ।
भक्तिमती मीराबाई भी अपनों के द्वारा ही उपेक्षित थी। और भी अनेकों ऐतिहासिक जन हुये हैं।सभी का वर्णन करना मुश्किल होगा।
आज के दौर में तो अधिकतर लोग ही आलोचनाओं, उपेक्षाओं के शिकार हो रहें हैं, लेकिन जो हित चिन्तन करते हुये कार्य कर रहें हैं, उन्हें आलोचनाओं की कोई परवाह नहीं। वे तो और अधिक दिलेरी और ऊर्जा से युक्त होकर आगे बढ़ रहें हैं। स्वामी रामदेव बाबाजी, आचार्य बाल कृष्ण जी, कई अच्छे समाज सेवी, कई अच्छे सन्त, कई अच्छे राजनीतिज्ञ आदि अनेकों उदाहरण हैं।
मेरी नजदीकी में भी कई उदाहरण हैं।मेरी जेठ की बेटी ही उदाहरण हैं।उनसे किसी ने उपेक्षा करते हुये कहा कि तुम क्या Doctor बनोगी? लेकिन उन्होंने अपने कठिन प्रयासों से Doctor बनकर दिखाया। अन्त में मेरा मानना यही है, कि किसी की भी आलोचनाओं को, उपेक्षाओं को, निन्दाओं को सकारात्मक सोच के साथ लिया जाये, तो उत्थान ही होता है।आलोचक चाहें कितनी भी घटिया सोच रखकर व्यवहार क्यों ना कर रहा हो, पर फायदा जिसकी आलोचना अथवा उपेक्षा की जा रही है उसको ही मिलेगा। मानव मन है सो थोड़ा दुःख तकलीफ अवश्य महसूस करेगा,पर मजबूत इरादे सफलता अवश्य दिलवायेंगें। किसी ने सत्य ही कहा है ~ 
निंदक नियरे राखिये,आँगन कुटी छवाय।
बिनु साबुन पानी बिनु, निर्मल करत सुभाय।।
अर्थात् -निन्दा करने वालों को अपने अत्यन्त नजदीक रखना चाहिये क्योंकि वे तो हमारी कमियों को बता-बताकर हमारा स्वभाव निर्मल करते रहते हैं, हालांकि बिना साबुन और पानी के वस्त्र साफ नहीं हो सकता, पर वे जब आलोचना करते हैं तो हमारी मलीनता साफ हो जाती है।
किसी सन्त से मैंने सुना था कि वराह (सूअर)तो अपनी भूख मिटाने के लिये विष्टा खाकर गन्दगी साफ करता है,पर एक आलोचक, एक निन्दक अपनी जिव्हा(जीभ) से बखान कर-करके गन्दगी साफ करता है और शान्ति पाता है। खैर, बस सकारात्मक सोच रखते हुये अपने सत्पथ पर आगे बढ़ते जाना है। 
दुनियाँ में सभी से कछ ना कुछ सीखा जा सकता है। सच्चा मित्र वही है जो सच्चा समाआलोचक भी हो। वह हमारा सबसे बड़ा शत्रु होता है जो बुराइयों को देखकर भी ना बताये। आज आपको एक राज की बात बताऊँ, हम अपने आपके आलोचक समालोचक,निन्दक स्वंय ही बने। फिर अपने आपको बुराइयों से, बुरे विचारों से, हम खुद ही बचा लेंगें। 
सच्चे आलोचक, समालोचक, निन्दक की जय

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