#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू गुरु गरवा मिल्या, ताथैं सब गमि होइ ।
लोहा पारस परसतां, सहज समाना सोइ ॥
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@Bharat Bendwal ~ सदुगुरु महिमा ~
श्री रामचरितमानस में आता है...
गुरु बिन भवनिधि तरहिं न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होई॥
भले ही कोई भगवान शंकर या ब्रह्मा जी के समान ही क्यों न हो किन्तु गुरु के बिना भवसागर नहीं तर सकता।
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सदगुरु का अर्थ शिक्षक या आचार्य नहीं है। शिक्षक अथवा आचार्य हमें थोड़ा बहुत एहिक ज्ञान देते हैं लेकिन सदगुरु तो हमें निजस्वरूप का ज्ञान दे देते हैं। जिस ज्ञान की प्राप्ति के मोह पैदा न हो, दुःख का प्रभाव न पड़े एवं परब्रह्म की प्राप्ति हो जाय ऐसा ज्ञान गुरुकृपा से ही मिलता है। उसे प्राप्त करने की भूख जगानी चाहिए। इसीलिए कहा गया है...
गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसको लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो दिखाय॥
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गुरु और सदगुरु में भी बड़ा अंतर है। सदगुरु अर्थात् जिनके दर्शन और सान्निध्य मात्र से हमें भूले हुए शिवस्वरूप परमात्मा की याद आ जाय, जिनकी आँखों में हमें करूणा, प्रेम एवं निश्चिंतता छलकती दिखे, जिनकी वाणी हमारे हृदय में उतर जाय, जिनकी उपस्थिति में हमारा जीवत्व मिटने लगे और हमारे भीतर सोई हुई विराट संभावना जग उठे, जिनकी शरण में जाकर हम अपना अहं मिटाने को तैयार हो जायें, ऐसे सदगुरु हममें हिम्मत और साहस भर देते हैं, आत्मविश्वास जगा देते हैं और फिर मार्ग बताते हैं जिससे हम उस मार्ग पर चलने में सफल हो जायें, अंतर्मुख होकर अनंत की यात्रा करने चल पड़ें और शाश्वत शांति के, परम निर्भयता के मालिक बन जायें।
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जिन सदगुरु मिल जाय,
तिन भगवान मिलो न मिलो।
जिन सदगरु की पूजा कियो,
तिन औरों की पूजा कियो न कियो।
जिन सदगुरु की सेवा कियो,
तिन तिरथ-व्रत कियो न कियो।
जिन सदगुरु को प्यार कियो,
तिन प्रभु को प्यार कियो न कियो।

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