॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१८. शब्दसार को अंग*
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*श्रोत्र उहै श्रुति सार सुनै नित,*
*नैंन उगे निज रूप निहारै ।*
*नाक उहै हरि नाक हि राखत,*
*जीभ उहै जगदीश उचारै ॥*
*हाथ उहै करिये हरि कौ कृत,*
*पांव उहै प्रभु के पथ धारै ।*
*शीस उहै करि स्याम समर्पन,*
*सुन्दर यौं सब कारिजे सारै ॥८॥*
'श्रोत्र' उसे ही कह सकते हैं जो निरन्तर वेदसार(ब्रह्मतत्व) सुनने में मग्न रहे । 'नेत्र' उन्हें कहा जा सकता है जिनके द्वारा निरन्तर आत्मसाक्षात्कार करने में तत्पर रहा जा सके ।
'नाक' विद्वानों द्वारा वही माना जाता है जो प्रभु परमात्मा की बनाई हुई इस अनमोल देह का नाक(सम्मान) रख सके; इसी प्रकार 'जिह्वा' उसे कहना चाहिये जो निरन्तर हरिनाम का उच्चारण करती रहे ।
'हाथ' भी उसे ही कहा जा सकता है जो निरन्तर प्रभु के बताये हुए कर्मों में लगा रहे । तथा 'पैर' वे कहलाते हैं जो प्रभु बताये मारग पर ही चलने में तत्पर रहें ।
'शीस' उसे कहिये जो भगवान् को समर्पित हो चुका हो । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - यदि हमारे शरीर के ये अवयव निरन्तर इन शुभ कृत्यों में लगे रहें तो हमारे सभी कार्य अनायास सिद्ध हो सकते हैं ॥८॥
(क्रमशः)

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