बुधवार, 14 जनवरी 2015

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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१०५. माया । मल्लिका मोद ताल ~
काहू तेरा मर्म न जाना रे,
सब भये दीवाना रे ॥टेक॥
माया के रस राते माते, जगत भुलाना रे ।
को काहू का कह्या न मानै, भये अयाना रे ॥१॥
माया मोहे मुदित मगन, खानखाना रे ।
विषिया रस अरस परस, साच ठाना रे ॥२॥
आदि अंत जीव जन्त, किया पयाना रे ।
दादू सब भ्रम भूले, देखि दाना रे ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, इस शब्द में बता रहे हैं कि सांसारिक प्राणी विषयासक्त माया के सुख स्त्री धन पुत्र आदि में फँसकर, सत्य स्वरूप परमेश्‍वर को भूल बैठे हैं ।
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प्रभु ! आपके मार्मिक स्वरूप को ये न जानकर, विषय - रस पीकर दीवाने हो रहे हैं । नाना प्रकार के मायिक रस को पीकर जगत के अज्ञानी प्राणी आपको भूल रहे हैं । यदि कोई विवेकी संत आपकी प्राप्ति का सद् उपदेश करे, तो उसको भी वह स्वीकार नहीं करते । ऐसे अयाने अर्थात् अनजान से बने रहते हैं कि मानो ये कुछ समझते ही न हों ?
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ऐसे अज्ञानियों को माया ने मोहित कर लिया है । उनका मन माया में ही प्रसन्न रहता है । अपने को वह राजाओं का भी राजा समझते हैं । विषयासक्त स्त्री आदि पदार्थों के रस में ओत - प्रोत रहते हैं ।
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अन्तःकरण से और वाणी से जिन्होंने सत्य का त्याग कर दिया है, इस प्रकार इस सृष्टि में, ऐसे जीव प्राणीमात्र, आदि से अन्त कहिए, महाप्रलय पर्यन्त, काल के मुँह में ही जाते हैं । सब कोई इस मायिक भ्रम में पड़कर, हे परमेश्‍वर ! आपको भूल गये हैं अर्थात् कई बुद्धि जीवी भी इसी भ्रम में भूल रहे हैं ।
(क्रमशः)

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