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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९२. ईश्वर चरित । त्रिताल ~
ये सब चरित तुम्हारे मोहना,
मोहे सब ब्रह्मण्ड खंडा ।
मोहे पवन पानी परमेश्वर,
सब मुनि मोहे रवि चंदा ॥टेक॥
साइर सप्त मोहे धरणी धरा,
अष्ट कुली पर्वत मेरु मोहे ।
तीन लोक मोहे जगजीवन,
सकल भुवन तेरी सेव सोहे ॥१॥
शिव बिरंचि नारद मुनि मोहे,
मोहे सुर सब सकल देवा ।
मोहे इन्द्र फणीन्द्र पुनि मोहे,
मुनि मोहे तेरी करत सेवा ॥२॥
अगम अगोचर अपार अपरम्परा,
को यहु तेरे चरित न जानैं ।
ये शोभा तुमको सोहे सुन्दर,
बलि बलि जाऊँ दादू न जानैं ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, ईश्वर के कार्य की अपारता दिखा रहे हैं कि हे मन मोहन परमेश्वर ! आपके सम्पूर्ण चरित्र अलौकिक हैं । आपने सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को, नौ खंड पृथ्वी को मोहित किये हैं, और हे परमेश्वर ! आपने पवन पानी सम्पूर्ण मुनि, सूर्य, चन्द्रमा, इन सबको मोहित किया है, जो आपकी आज्ञा पालन रूप सेवा में लगे रहते हैं ।
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हे प्रभु ! आपने सातों समुद्र और वासुकी नाग, अष्ट कुली पर्वत, सुमेरु, इन सबको आपने मोहित किया है । आपकी सेवा में ये लगे हुए हैं । हे जगत् के जीवन ! तीनों लोकों को और उसमें जो सृष्टि आबाद हो रही है, सबको आपने मोहित कर रखे हैं और सम्पूर्ण भवनों में निवास करने वाले सभी, आपकी सेवा करके ही शोभा को प्राप्त हो रहे हैं ।
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हे नाथ ! आपने शिवजी, ब्रह्माजी, नारद मुनि, इन सबको आपने मोहित कर रखा है, जो आपकी आज्ञा में बरत रहे हैं । और सम्पूर्ण देवताओं को भी आपने मोहित किया हैं । इन्द्र, शेष जी, इनको भी आपने मोहित कर रखा है और सभी मुनियों को भी आपने मोहित किये हैं, जो यह सब ही आपकी आज्ञा पालन रूप सेवा कर रहे हैं ।
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हे अगम ! आपके चरित्र इन्द्रियातीत हैं, जाने नहीं जाते । आपसे परे कोई भी नहीं है, सबसे परे और सर्व से नजदीक, आप ही हैं । हे नाथ ! आपके चरित्र इन्द्रियों से जाने नहीं जाते । हे सुन्दर ! यह शोभा आपको ही शोभनीय है । हम तो आपकी और आपकी शोभा की बार - बार बलिहारी जाते हैं ।
(क्रमशः)

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