गुरुवार, 1 जनवरी 2015

*~रत्नपुरा प्रसंग~*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*~रत्नपुरा प्रसंग~*

रत्नपुरा प्रसंग के समय माधव ने पू़छा - स्वामिन् ! निर्वाण पद कब प्राप्त होता है ? तब दादूजी ने कहा -
परमातम से आतमा, ज्यों जल उदक समान ।
तन मन पाणी लौंण ज्यों, पावे पद निर्वाण ॥३२॥
(लै अंग ७)
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रामदास ने पू़छा - भगवन् ! शरीराध्यास कैसे छूटता है ? दादूजी ने कहा -
यूं मन तजे शरीर को, ज्यों जागत सो जाय ।
दादू विसरे देखतां, सहज सदा ल्यौ लाय ॥३४॥
(लै अंग ७)
रत्नपुरा के भक्तों को सत्संग का सुख प्रदान करके फिर सांभर पधारे ।

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