॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१८. शब्दसार को अंग*
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*चाप उहै कसिये रिपु ऊपरि,*
*दाप उहै दलकारि ही मारै ।*
*छाप उहै हरी आप दई सिर,*
*थाप उहै थपि और न धारै ॥*
*जाप उहै जपिये अजपा नित,*
*खांप उहै निज खांप बिचारै ।*
*बाप उहै सबकौ प्रभु सुन्दर,*
*पाप हरै अरु ताप निवारै ॥४॥*
'चाप'(धनुष या विग्रह) उसे माना जाता है जो केवल शत्रु पर ताना जाय, और 'दाप'(क्रोध) उसे कहते हैं जो शत्रु को ललकार कर मारने की सामर्थ्य रखे ।
किसी का पहचान का चिन्ह उस का शिर होता है जो भगवान् ने स्वयं हमारे शरीर पर रख दिया है, तथा किसी सिद्धान्त या मत की स्थापना वही स्थिर कहलाती है जिसमें बार बार परिवर्तन न हो ।
'सोऽहं' मन्त्र का अजपा जाप ही वास्तविक 'जाप' कहलाता है, तथा 'खांप'(जाति या गोत्र) वही कहलाती है जिसकी उच्चता का उस जाति वाले को अभिमान हो ।
श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - वास्तविक 'बाप'(पिता) वह परमात्मा ही माना जाता है जो सब के पाप एवं कष्टों का निवारण करता रहता है ॥४॥
(क्रमशः)

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