सोमवार, 12 जनवरी 2015

= १०३ =

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) 
राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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१०३. तर्क चेतावनी । राज विद्याधर ताल ~
मन मतिहीण धरै,
मूरख मन कछु समझत नाहीं, ऐसैं जाइ जरै ॥टेक॥
नाम बिसार अवर चित राखै, कूड़े काज करै ।
सेवा हरि की मनहुँ न आणै, मूरख बहुरि मरै ॥१॥
नाम संगम कर लीजे प्राणी, जम तैं कहा डरै ।
दादू रे जे राम संभारै, सागर तीर तिरै ॥२॥
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टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, जिज्ञासुओं को तर्क - पूर्वक उपदेश करते हैं कि यह मूर्ख मन, नीच विचार धारण करके विषयों की ओर प्रवृत्त होकर, विषय - वासनाओं के सुख रूप दुःख में जलता रहता है ।
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परमेश्‍वर के निष्काम नाम स्मरण की भूलकर अपने चित्त में लोक - परलोक के मायिक सुखों की वासना करता रहता है और खोटे कर्मों में प्रवृत्त होता है । यह मूर्ख मन परमेश्‍वर की भक्ति से विमुख रहकर बार - बार जन्मता मरता है ।
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हे प्राणधारी ! निष्कामी नाम स्मरण द्वारा परमेश्‍वर से अपना सम्बन्ध कायम कर ले । फिर यमराज से क्या डरता है ? जिन्होंने राम का स्मरण किया है, वे संसार - समुद्र से तैर गये हैं ।
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कुकर्मो कुसंगी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः ।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाऽ हं
गतिस्त्वं गतिस्त्वमे को दयालुः ॥१०३॥

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