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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९३. गरु ज्ञान । त्रिताल ~
ऐसा रे गुरु ज्ञान लखाया,
आवै जाइ सो दृष्टि न आया ॥टेक॥
मन थिर करूँगा, नाद भरूँगा,
राम रमूंगा, रस माता ॥१॥
अधर रहूँगा, करम दहूँगा,
एक भजूंगा, भगवंता ॥२॥
अलख लखूंगा, अकथ कथूंगा,
एक मथूंगा, गोविन्दा ॥३॥
अगह गहूँगा, अकह कहूँगा,
अलह लहूँगा, खोजन्ता ॥४॥
अचर चरूंगा, अजर जरूंगा,
अतिर तिरूंगा, आनन्दा ॥५॥
यहु तन तारूं, विषय निवारूं,
आप उबारूं, साधन्ता ॥६॥
आऊँ न जाऊँ, उनमनि लाऊँ,
सहज समाऊँ, गुणवंता ॥७॥
नूर पिछाणूं, तेजहि जाणूं,
दादू ज्योतिहि देखन्ता ॥८॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें गुरु के ज्ञान से होने वाले लाभ को दिखा रहे हैं । गुरुदेव के ज्ञान ने हमैं ऐसा बताया है कि जो जन्मने और मरने वाले हैं हम उसे परमात्मा रूप से नहीं देखते ।
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हम तो अपने मन को स्थिर करके गुरुदेव के ज्ञानरूप शब्द को अन्तःकरण में भरेंगे और फिर निर्गुण राम में रमेंगे । इस प्रकार प्रेमाभक्ति के रस में मतवाले रहेंगे । और माया आदि गुणों से अधर रहकर सम्पूर्ण कर्मों का नाश करेंगे और एक सजातीय, विजातीय स्वगत भेद रहित परमेश्वर को भजेंगे ।
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उस अलख को अनुभव द्वारा देखेंगे । अकथ को अकथ ही कहकर कथन करेंगे । और एक गोविन्द के नाम का ही विचार करेंगे । अगह कहिए मन इन्द्रियों का अविषय, उसको अगह करके ग्रहण करेंगे । अकह को अकह ही कहकर कथन करेंगे । ‘अलह’ - तल स्पर्श रहित को, विचार द्वारा खोजकर ग्रहण करेंगे । ‘अचर’ - इन्द्रियों का अविषय अनुभव द्वारा भजन करेंगे । उस अजर अमर के भजन की जरणा करेंगे । यह ‘अतिर’ शरीर को पाप - ताप से रहित करके, तरेंगे । उस आनन्द स्वरूप में स्थिर रहेंगे ।
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विषयों का त्याग करके इस मनुष्य शरीर को सफल करेंगे । अन्तरंग साधनों के द्वारा संसार से अपने आप को उबारेंगे । आवागमन रूप चक्र से रहित होकर ब्रह्मी अवस्था में अपने आपको स्थिर करेंगे । सहज अवस्था रूप समाधि में इस गुणरूप शरीर को लय चिन्तन द्वारा अभेद करेंगे । अपना आत्मस्वरूप शुद्ध ब्रह्म को तेजोमय जानकर उसी में स्थिर रहेंगे । इस प्रकार जीव ब्रह्म की एकता रूप ज्ञान - ज्योति को देखेंगे ।
(क्रमशः)

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