गुरुवार, 1 जनवरी 2015

= ७८ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
मति बुद्धि विवेक विचार बिन,
माणस पशु समान । 
समझायां समझै नहीं, दादू परम गियान ॥
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साभार : Rp Tripathi ~
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हम भगवान् के हाथ में कठ-पुतली अवश्य हैं, पर कर्म से भागने की स्वीकृति भगवान नहीं देते, कर्म करने के लिए बुद्धि, विवेक, विचार दिए हैं, परिवार का पालक पिता निष्कर्म होकर सो जाय और कहे सब भगवान कि इच्छा अनुसार हो रहा है तो वह अपने कर्म से चूक जायगा …… ईश्वर के हाथ की कठपुतली यानी कर्म से भागना नहीं है बल्कि जो परिस्थिति सामने हो उसे सहज रूप बिना राग द्वेष के ईमानदारी पूर्वक जीना है ।
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एक दिन, एक माता पिता के पास, उनका जिगर का टुकड़ा (नव-युवक पुत्र/पुत्री), विद्यालय से वापिस आकर, अपना रिपोर्ट कार्ड दिखाता है, जिसमें वह फ़ैल हो गया है, और कहता है -
माँ-पिताजी, मैं क्या यह सारा संसार ही, भगवान् के हाँथ में कठ-पुतली हैं , यह सब पास-फ़ैल, पहले से ही लिखा जा चुका है ..!! अब मैं दोस्तों के साथ शराब भी पी लेता हूँ, कभी कभी माँस भी खा लेता हूँ, कभी कभी कोठे पर भी चला जाता हूँ, .. आदि आदि ..., तो इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, यह सब तो पूर्व-निश्चित है ...!! अतः आप लोग शाँत रहें ..!!
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(क). क्या आप सहमत है, इस संतान के तर्क से ..?
(ख). नहीं ..? तो क्यों ..?
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One day, a beloved ward (Son/Daughter), comes from a college & shows his report-card, to Parents, in which he/she has failed & tells the Parents --
My dear mother-father, not only I alone, but the entire Universe is like the puppets in the hands of God, this pass-fail is already being written earlier ..!! I drink Alcohol with friends, some times I eat meat, at times I visit prostitutes too, this is all written already, so you both please, be quite & live happily ..!!
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(a). Are you satisfied with, the views of the dear child ..?
(b). If not, then, ..why ..?

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