#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१९. सूरातन को अंग*
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*पांव रोपि रहै रण मांहिं रजपूत कोऊ,*
*हय गय गाजत जुरत जहां दल है ।*
*बाजत झुझाऊ सहनाई सिंधू राग पुनि,*
*सुनत ही काइर की छूटि जात कल है ॥*
*झलकत बरछी तिरछी तरवारि बहै,*
*मार मार करत परत खलभल है ।*
*ऐसै जुद्ध में अडिग सुन्दर सुभट सोई,*
*घर मांहिं सूरमां कहावत सकल है ॥३॥*
कोई वीर क्षत्रियपुत्र ही उस युद्ध में पैर जमा सकता है जहाँ हाथी चिघांड़ रहे हों, घोड़े हिनहिना रहे हों तथा शत्रुसमूह एकत्र हो ।
जहाँ जुझारू(युद्ध के) बाजे बज रहे हों, सिन्धुराग(सिन्धुरा) सुनायी पड़ रहा हो, जिसे सुनकर कायरों का चित्त डावाँडौल(विह्वल) हो जाता है ।
जहाँ बरछी चल रही हो, बाँकी टेढ़ी तलवारों की खनखनाहट हो, जहाँ सब तरफ से 'मारोकाटो' की ध्वनियाँ सुनायी पड़ रही हों, जहाँ सब कुछ अस्त व्यस्त(खड़ भड़) हो ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसे भयानक युद्ध में कोई वीर सुभट योद्धा ही दृढ़ता से टिक कर सर्वथा विजयी कहला सकता है । (अन्यथा)घर में तो सभी सैनिक अपनी वीरता की डींग हाँकते हैं ॥३॥
(क्रमशः)

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