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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*
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फिर गैंदीदास ने पू़छा - स्वामिन् ! तत्व साक्षात्कार करने वाले महानुभाव प्रभु को कैसे देखते है ? तब दादूजी ने २३६ का पद कहा -
२३६. परिचय उपदेश । चौताल
पीव पीव, आदि अंत पीव ।
परसि परसि अंग संग, पीव तहाँ जीव ॥टेक॥
मन पवन भवन गवन, प्राण कँवल मांहि ।
निधि निवास विधि विलास, रात दिवस नांहि ॥१॥
सास वास आस पास, आत्म अंग लगाइ ।
ऐन बैन निरख नैन, गाइ गाइ रिझाइ ॥२॥
आदि तेज अंत तेज, सहजैं सहज आइ ।
आदि नूर अंत नूर, दादू बलि बलि जाइ ॥३॥
उक्त पद सुनकर गैदीदास अति प्रसन्न हुये ।
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फिर तिलोकदास ने पू़छा - भगवन् ! आप जिस ब्रह्म की बलिहारी जाते हैं, उसका स्वरूप कैसा है ?
दादूजी ने २३७ का पद कहा -
२३७.(फारसी) चौताल
नूर नूर अव्वल आखिर नूर ।
दायम कायम कायम दायम, हाजिर है भरपूर ॥टेक॥
आसमान नूर, जमीं नूर, पाक परवरदिगार ।
आब नूर, बाद नूर, खूब खूबां यार ॥१॥
जाहिर बातिन, हाजिर नाजिर, दाना तूँ दीवान ।
अजब अजाइब, नूर दीदम, दादू है हैरान ॥२॥
सुनाकर समझाया । तब सब प्रसन्न होकर राजमहल को चले गये । चौथे दिन उदयसिंह और साँवलदास अपने दोनों भाइयों के साथ नारायणसिंह, त्रिपोलिया पर दादूजी के पास आये और प्रणाम करके बैठ गये ।

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