शनिवार, 3 जनवरी 2015

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९४. तत्व उपदेश । पंचम ताल ~
बंदे हाजिरां हजूर वे, 
अल्लह आली नूर वे ।
आशिकां रा सिदक साबित, 
तालिबां भरपूर वे ॥टेक॥
वजूद में मौजूद है, 
पाक परवरदिगार वे ।
देख ले दीदार को, 
गैब गोता मार वे ॥१॥
मौजूद मालिक तख्त खालिक, 
आशिकां रा ऐन वे ।
गुदर कर दिल मग्ज भीतर, 
अजब है यहु सैंन वे ॥२॥
अर्श ऊपर आप बैठा, 
दोस्त दाना यार वे ।
खोज कर दिल कब्ज कर ले, 
दरूने दीदार वे ॥३॥
हुशियार हाजिर चुस्त करदा, 
मीरां मेहरवान वे ।
देख ले दर हाल दादू, 
आप है दीवान वे ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव तत्व सार का उपदेश कर रहे हैं कि हे जिज्ञासु ! परमेश्‍वर के प्रेमी अनन्य निष्काम भक्ति द्वारा हृदय में परमेश्‍वर के सामने हाजिर रहते हैं । वही अल्लह का ‘आले’ जो श्रेष्ठ स्वरूप है, उसका दर्शन करते हैं । परमेश्‍वर के प्रेमी, परमेश्‍वर की प्राप्ति के मार्ग में, ‘सिदक साबित’= पूरा निश्‍चय रखने वाले, ‘तालिबा= दर्शनों की इच्छा चाहने वाले मुमुक्षु जो सबमें व्यापक परमेश्‍वर है, उसके सन्मुख रहते हैं ।
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वह परमेश्‍वर इस शरीर में ही साक्षीरूप से मौजूद है । ‘पाक’ कहिए पवित्रों से भी पवित्र सबका पालन करने वाले परमेश्‍वर का दीदार नाम दर्शन अचानक सहसा प्राप्त करते हैं । वह सबका स्वामी हृदय रूपी तख्त पर स्थित है । वह सम्पूर्ण खलक को रचने वाला है । अपने प्रेमियों को साक्षात्कार होता है । तूँ अन्तर्मुख वृत्ति द्वारा, नख से शिखा पर्यन्त, दिल दिमाग में, जो व्याप्त हो रहा है, उसको देख ।
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यही ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सैन कहिए, उपदेश है । हृदय रूपी आकाश में आप स्थिर हो रहा है । वह तेरा ‘दोस्त’= मित्र, ‘दाना’= जबर्दस्त, सर्वशक्तिमान भक्तों का यार, अर्थात् मित्र, उसको ज्ञान - भक्ति - वैराग्य द्वारा, अपने दिल को कहिए मन को अन्तर्मुख करके भीतर ही उसका दीदार कर ।
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इस प्रकार जो साधन - सम्पन्न चतुर जिज्ञासु हैं, उस परमेश्‍वर का दीदार करते हैं । तब तत्ववेत्ता मुक्तपुरुष मुमुक्षुओं को कहते हैं कि उपरोक्त मार्ग द्वारा तुम भी, ‘दरहाल कहिए तत्काल तुम्हारे भीतर ही, उस दीवान न्यायकारी अन्तर्यामी ईश्‍वर का साक्षात्कार करो ।
(क्रमशः)

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