शनिवार, 3 जनवरी 2015

*करड़ाला प्रसंग से आगे*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*करड़ाला प्रसंग से आगे*
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एक दिन करड़ाले में लालदासनागा नामक सज्जन ने दादूजी से पू़छा - स्वामिन् ! ब्रह्म साक्षात्कार के साधन की कोई सीमा है क्या ?
दादूजी ने कहा -
दादू निबहै त्यों चले, धीरैं धीरज मांहिं ।
परसेगा पिव एक दिन, दादू थाके नांहिं । ॥३८॥
(लै अंग ७)
फिर लालदासनागा दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये सौ शिष्यों में हैं ।
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गंगादास ने पू़छा - स्वामिन् ! अज्ञान निद्रा से जागने की क्या पहचान है ? तब दादूजी ने कहा -
आदि अंत मधि एक रस, टूटे नहिं धागा ।
दादू एकै रह गया, तब जाणी जागा ।
फिर गंगादास दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये दादूजी के सौ शिष्यों में हैं ।
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फिर एक दिन द्वितीय गंगादास ने पू़छा - भगवन् ! निरंजन ब्रह्म में मन लगने की क्या पहचान है ? कृपा करके बताइये । दादूजी ने कहा -
जब मन मृतक हो रहै, इन्द्रिय बल भागा ।
काया के सब गुण तजे, निरंजन लागा ॥
फिर द्वितीय गंगादास भी दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये भी सौ शिष्यों में हैं ।
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इन्हीं दिनों में लाला बणजारे का पुत्र चतुर्भुज बणजारा सांभर में अपने बालद लेकर आया था । उसे ज्ञात हुआ कि मेरे पिता के गुरु दादुजी करड़ाले ग्राम में हैं । अतः वह करड़ाले आया । दादूजी को प्रणामादि करके सामने बैठा तब दादूजी ने उसे पद ३८७ -
३८७. उपदेश । धीमा ताल
मन मैला मन ही सौं धोइ, उनमनि लागै निर्मल होइ ॥टेक॥
मन ही उपजै विषय विकार, मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥१॥
मन ही दुविधा नाना भेद, मन ही समझै द्वै पख छेद ॥२॥
मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥३॥
मन ही उपजै अग्नि शरीर, मन ही शीतल निर्मल नीर ॥४॥
मन उपदेश मनहीं समझाइ, दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥५॥
सुनाया था । उक्त उपदेश सुनकर चतुरभुज पिता के समान विरक्त हो गया था और दादूजी का शिष्य होर रामपुरा(पूर्व) में भजन करके सिद्धावस्था को प्राप्त हो गया था । ये ५२ में हैं ।

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