गुरुवार, 8 जनवरी 2015

१९. सूरातन को अंग ~ १

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१९. सूरातन को अंग* 
*मनहर छंद*
*सुणत नगारै चोट बिगसै कंवल मुख,* 
*अधिक उछाह फूल्यौ माइ हूं न तन मैं ।* 
*फेरै जब सांगि तब कोऊ नहिं धीर धरै,* 
*काइर कंपाइमान होत देखि मन मैं ॥* 
*टूटिकै पतंग जैसें परत पावक मांहि,* 
*ऐसैं टूटि परै बहु सावंत के घन मैं ।* 
*मारि घमासांण करि सुन्दर जुहारै स्यांम,* 
*सोई सूरबीर रूपि रहै जाइ रन मैं ॥१॥* 
*वीर योद्धा के लक्षण* : सच्चा वीर योद्धा वही है जिसका मुखकमल युद्ध वाद्य(नगाड़ा) सुन कर खिल उठता है तथा वह अधिक उत्साह सम्पन्न होकर अपने शरीर में फूला नहिं समाता । 
तब यह मोर्चे पर जाने के लिये अधीर हो उठता है । परन्तु इसके विपरीत, कायर योद्धा युद्ध की बात सुनकर नब ही मन काँप उठता है । 
परन्तु पतंग(कीट) जैसे अति उत्साह के साथ दीपक की लौ पर टूट पड़ता है उसी प्रकार वीर योद्धा लड़ते लड़ते शत्रु सैनिकों बीच में प्रवेश कर जाता है । 
और भयंकर युद्ध करता हुआ वह वीर युद्ध में विजय पाकर ही लौटता है । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वस्तुतः शूर वीर ऐसे ही योद्धा को कहा जाता है जो युद्ध में जा कर वीरता से डटा रहे ॥१॥
(क्रमशः)

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