मंगलवार, 13 जनवरी 2015

१९. सूरातन को अंग ~ ६

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१९. सूरातन को अंग* 
*अधिक अजानबाहु मन मैं उछाह किये,*
*दीये गजगाह मुख बरखत नूर है ।*
*काढै जब करवाल बाल सब ठाढे होहि,*
*अति बिकराल पुनि देखत करूर है ॥*
*नैंक न उसास लेत फौज कौं फिटाइ देत,*
*खेत नहिं छाडै मारि करै चकचूर है ।*
*सुन्दर कहत ताकी कीरति प्रसिद्ध होइ,*
*सोई सूरबीर धीर स्याम कै हजूर है ॥६॥*
लम्बी भुजाओं वाला, उत्साह सम्पन्न वह वीर योद्धा रण में जब हाथियों को क्षत विक्षत कर गिरा देता है, उस समय उस के मुखमण्डल पर एक विचित्र(अपूर्व) आभा चमकने लगती है । 
वह जब म्यान से तलवार निकाल कर युद्ध में खड़ा होता है तब उसे देखकर वीरहृदय पुरुषों को भी भय के कारण रोमाञ्च होने लगता है, वे उसे देखकर अपने स्थान पर किंकर्तव्यमूढ़ हुए खड़े ही रह जाते हैं । वह उस समय दीखने में भयप्रद एवं क्रूर लगता है । 
वह युद्ध में कहीं ठहरता नहीं, न विश्राम ही करता है । समस्त शत्रुदल को पराजित किये बिना युद्ध स्थल से पीछे नहीं लौटाता, अपितु समस्त शत्रुदल को विनष्ट कर के ही वहाँ से आता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसे वीर का जगत् में यश फैला करता है । तथा प्रभु परमात्मा के दरबार में वही धैर्यवान् शूर एवं वीर कहलाता है ॥६॥
(क्रमशः)

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