卐 सत्यराम सा 卐
माया मारै लात सौ, हरि को घालै हाथ ।
संग तजै सब झूठ का, गहै साच का साथ ॥
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@बिष्णु देव चंद्रवंशी ~
--||●||●|| लोक परलोक ||●||●||--
लोक - परलोक में सर्वत्र सुख - शान्ति चाहते हो तो सर्वशक्तिमान परमात्मा की शरण लो मोक्ष तो मिलेगा ही, धन - धान्य व मान - प्रतिष्ठा भी मिलेगी।
यह न समझो कि परमात्मा के भजन से केवल मोक्ष ही मिलेगा - निश्चय रखो कि भगवान् के भजन से मोक्ष भी मिलेगा और धन - धान्य, मान - प्रतिष्ठा भी मिलेगी।
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इसका कारण यह है कि भक्त भगवान् की उपासना करता है और भक्ति की पहली सीढ़ी श्रवण' दूसरी सीढ़ी 'कीर्तन' और तीसरी सीढ़ी स्मरण' को पार करके जब चौथी सीढ़ी में पहुँच कर………
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स्त्री यह कभी नहीं चाहती कि उसका पति किसी दूसरे से प्रेम करे। इसलिये उस भक्त को भगवच्चिन्तन से हटाने से लिये विघ्न रूप में लक्ष्मी उसे धन, यश, मान, प्रतिष्ठा देना प्रारम्भ करते हैं जिससे वह इसी लौकिक जाल में पड़ जाय और भगवान् को छोड़ दे। इस प्रकार भगवान के भक्तों के पास लक्ष्मी विघ्न रूप में आती है।
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आज आप जिसका इष्ट बुद्धि से चिन्तन करते हुए रात दिन परेशान हों और मारे - मारे भटकते हों वही रुपया - पैसा, मान - प्रतिष्ठा जबरदस्ती बिना आवाहन के आप के पास आयेगा, आप भगवान् की तरफ तो झुको।
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गति - मुक्ति के लिये तो भगवान का भजन है ही, किन्तु लौकिक ऐश्वर्य चाहते हो तो भी भगवान् की शरण में आओ। साधक जब तप करता है तो देवराज इन्द्र का आसन डोल जाता है और वह तप में विघ्न करने के लिये नाना प्रकार के प्रलोभन सामने उपस्थित करता है इसी प्रकार भगवान का स्मरण छुटाने के लिये लक्ष्मी लौकिक ऐश्वर्य सामने लाती है। जिस प्रकार जब कोई कुत्ता काटने को दौड़े तो रोटी का दुकड़ा फेंक दो, वह उसी में उलझ कर रह जाता है ठीक उसी प्रकार लक्ष्मी भी सोने का टुकड़ा फेंकती है कि जिससे वे भक्त मेरे पति भगवान् के निकट न आवें तो अच्छा है!
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भगवान के स्मरण से गति - मुक्ति भी होगी और लक्ष्मी भी धक्का खाएगी। व्यापार ऐसा करो जिसमें अधिक लाभ हो।
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तात्पर्य कहने का यह है कि भगवान के भजन से सब कुछ हो जाता है। जब तुम सर्वशक्तिमान का ध्यान अपनी तरफ खींच लोगे तो तुम्हारे लिये क्या अप्राप्त रह सकता है। आजकल अपना घर छोड़ कर भी लोग सेठों के यहाँ धक्का खाते - फिरते हैं। उन्हें धनवान का विश्वास है परन्तु सर्वशक्तिमान का विश्वास नहीं है। तभी दरवाजे - दरवाजे वे ठोकर खाते हैं।
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जिन्हें भगवान का विश्वास है उनके पीछे संसार आज भी धक्का खा रहा है। इसलिये जब किसी का स्तोत्र करना ही ह तो भगवान का ही स्तोत्र करो जिससे लोक - परलोक दोनों बने।
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लौकिक वासना कम करो और परमात्मा में राग बढ़ाओ। मनुष्य शरीर का यही उपयोग है कि विचार करके उस रास्ते पर चलो जहाँ सब प्रकार की सुविधा मिले।

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