रविवार, 4 जनवरी 2015

१८. शब्दसार को अंग ~ ७

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१८. शब्दसार को अंग* 
*स्वास उहै जु उस्वास न छाड़त,*
*नास उहै फिर होइ न नाशा ।* 
*पास उहै सत पास लगै,*
*जम पास कटै, प्रभु कै नित पासा ॥* 
*बास उहै गृह बास तजै,*
*बनबास नहीं तिंहि ठाहर बासा ।* 
*दास उहै जु उदास रहै,*
*हरिदास सदा कहि सुन्दरदासा ॥७॥* 
'श्वास' वह माना जाता है जिसके पीछे उच्छ्वास न लगा हो । 'नाश' उसे कहते हैं जिसके पीछे नाश की परम्परा न चल सके । 
'सामीप्य'(पास) वह है जिससे निरन्तर समीपता बनी रहे, जो मृत्युजाल को काट सके तथा सदा परमात्मा का साथ बनाये रखे । 
वास्तविक 'वास'(रहना) वही है जिसके सहारे से गृहस्थ का जञ्जाल छूट सके; वनवास को वास नहीं कह सकते, जहाँ कि कुछ ही दिन ठहरना सम्भव है । 
इसी प्रकार 'दास' उसे ही मान सकते हैं जो संसार नित्य उदास रहे । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - वस्तुतः 'दास' वही है जो नित्य निरन्तर प्रभु परमात्मा का दास(भक्त) बना रहे ॥७॥ 
(क्रमशः)

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