🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*~ त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*
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फिर उदयसिंह ने प्रार्थना की - स्वामिन् ! कोई प्रभु संबन्धी वार्ता सुनाइये ? तब दादूजी ने २४० का पद कहा -
कासौं कहूं हो अगम हरि बाता, गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥
उक्त पद सुनकर उदयसिंह आदि सभी सभासद प्रसन्न हुये ।
.
फिर साँवलादास ने प्रार्थना की - भगवन् ! निजी अनुभव का उपदेश कीजिये ? तब दादूजी ने २३९ का पद कहा -
२४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल
कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ,
गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥टेक॥
संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥१॥
वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥२॥
प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥३॥
जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥४॥
उक्त पद को सुनकर सब प्रसन्नता से प्रणाम करके राजमहल को चले गये ।
.
पांचवें दिन नारायण नरेश नारायणसिंह भाई भोजराज तथा भीमराज के साथ दादूजी के पास त्रिपोलिय पर आये और प्रणाम करके बैठ गये । फिर भीमराज ने पू़छा - स्वामिन् ! परब्रह्म स्वरूप का परिचय दीजिये ? दादूजी ने २४३ का पद -
२४३. हैरान । राज विद्याधर ताल
थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥टेक॥
जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥१॥
साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥२॥
अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥३॥
अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥४॥
उक्त पद को सुनकर भीमराज अति प्रसन्न हुये ।
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फिर भोजराज ने कहा - स्वामिन् ! आपने ब्रह्म को अकथनीय कहा है किन्तु ब्रह्म का कथन विद्वान लोग तो करते ही रहते हैं । भोजराज की उक्त शंका का समाधान करने की दादूजी ने २४४ का पद कहा -
२४४. मल्लिका मोद ताल
अविगत की गति कोइ न लहै, सब अपना उनमान कहै ॥टेक॥
केते ब्रह्मा वेद विचारैं, केते पंडित पाठ पढ़ैं ।
केते अनुभव आतम खोजैं, केते सुर नर नाम रटैं ॥१॥
केते ईश्वर आसन बैठे, केते जोगी ध्यान धरैं ।
केते मुनिवर मन को मारैं, केते ज्ञानी ज्ञान करैं ॥२॥
केते पीर केते पैगम्बर, केते पढ़ैं कुराना ।
केते काजी केते मुल्लां, केते शेख शयाना ॥३॥
केते पारिख अन्त न पावैं, वार पार कछु नांहीं ।
दादू कीमत कोई न जानैं, केते आवैं जांहीं ॥४॥
उक्त पद सुनकर भोजराज आदि सभी सभासदों ने मस्तक नमाकर स्वीकार किया । फिर प्रणाम करके राजमहल को चले गये ।
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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*~ त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*
.
फिर उदयसिंह ने प्रार्थना की - स्वामिन् ! कोई प्रभु संबन्धी वार्ता सुनाइये ? तब दादूजी ने २४० का पद कहा -
कासौं कहूं हो अगम हरि बाता, गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥
उक्त पद सुनकर उदयसिंह आदि सभी सभासद प्रसन्न हुये ।
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फिर साँवलादास ने प्रार्थना की - भगवन् ! निजी अनुभव का उपदेश कीजिये ? तब दादूजी ने २३९ का पद कहा -
२४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल
कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ,
गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥टेक॥
संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥१॥
वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥२॥
प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥३॥
जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥४॥
उक्त पद को सुनकर सब प्रसन्नता से प्रणाम करके राजमहल को चले गये ।
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पांचवें दिन नारायण नरेश नारायणसिंह भाई भोजराज तथा भीमराज के साथ दादूजी के पास त्रिपोलिय पर आये और प्रणाम करके बैठ गये । फिर भीमराज ने पू़छा - स्वामिन् ! परब्रह्म स्वरूप का परिचय दीजिये ? दादूजी ने २४३ का पद -
२४३. हैरान । राज विद्याधर ताल
थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥टेक॥
जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥१॥
साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥२॥
अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥३॥
अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥४॥
उक्त पद को सुनकर भीमराज अति प्रसन्न हुये ।
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फिर भोजराज ने कहा - स्वामिन् ! आपने ब्रह्म को अकथनीय कहा है किन्तु ब्रह्म का कथन विद्वान लोग तो करते ही रहते हैं । भोजराज की उक्त शंका का समाधान करने की दादूजी ने २४४ का पद कहा -
२४४. मल्लिका मोद ताल
अविगत की गति कोइ न लहै, सब अपना उनमान कहै ॥टेक॥
केते ब्रह्मा वेद विचारैं, केते पंडित पाठ पढ़ैं ।
केते अनुभव आतम खोजैं, केते सुर नर नाम रटैं ॥१॥
केते ईश्वर आसन बैठे, केते जोगी ध्यान धरैं ।
केते मुनिवर मन को मारैं, केते ज्ञानी ज्ञान करैं ॥२॥
केते पीर केते पैगम्बर, केते पढ़ैं कुराना ।
केते काजी केते मुल्लां, केते शेख शयाना ॥३॥
केते पारिख अन्त न पावैं, वार पार कछु नांहीं ।
दादू कीमत कोई न जानैं, केते आवैं जांहीं ॥४॥
उक्त पद सुनकर भोजराज आदि सभी सभासदों ने मस्तक नमाकर स्वीकार किया । फिर प्रणाम करके राजमहल को चले गये ।

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