रविवार, 11 जनवरी 2015

= १०२ =

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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१०२. विनती । राज विद्याधर ताल ~
दयाल अपनै चरणनि मेरा चित्त लगावहु, 
नीकैं ही करी ॥टेक॥
नखशिख सुरति सरीर, 
तूँ नांव रहौं भरी ॥१॥
मैं अजाण मतिहीण, 
जम की पाश तैं रहत हूँ डरी ॥२॥
सबै दोष दादू के दूर कर, 
तुम ही रहो हरी ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव नित्य प्रभु के नाम - स्मरण परायण रहने के लिये विनती कर रहे हैं कि हे दयालु परमेश्‍वर ! आपके तेजपुंज रूपी चरणों में, हमारे चित्त को अच्छी प्रकार स्थिर रखिये । 
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हम नख से शिखा पर्यन्त सारे शरीर में आपके नाम - स्मरण से सुरति द्वारा पूर्ण रहें । 
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हे प्रभु ! हमारी ‘मति’ कहिए बुद्धि, बहुत गिरी हुई है, आपको जानने की इसमें शक्ति नहीं है । इसीलिए हम यमराज की फाँसी से डरते हैं । आप ही उस फांसी से हमें मुक्त करेंगे । 
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हे नाथ ! हमारे में तो सब प्रकार के दोष भरे हुए हैं, परन्तु आप ही उन सबको दूर करके, हे हरि ! हमारे हृदय में सदैव आप ही प्रकट रहिये ।
(क्रमशः)

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