मंगलवार, 6 जनवरी 2015

१८. शब्दसार को अंग ~ ९

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१८. शब्दसार को अंग* 
*सोवत सोवत सोइ गयौ शठ,*
*रोवत रौवत कै बर रोयौ ।* 
*गोवत गोवत गोइ धर्यौ धन,*
*खोवत खोवत तैं सब खोयौ ॥* 
*जोवत जोवत बीति गये दिन,*
*बोवत बोवत लै बिख बोयौ ।* 
*सुन्दर सुन्दर रांम भज्यौ नहिं,*
*ढोवत ढोवत बोझ हि ढोयौ ॥९॥* 
रे मूर्ख ! तूँ सोते सोते ऐसा सो गया कि तुझे अब अपना कर्त्तव्यबोध ही नहीं रह गया तूँ इस जगत्प्रपंच में पड़कर कितनी बार रोया है । 
तूँ ने यह धन कमा कमा कर कितना छिपाया है, तथा अज उसको खोते खोते सब कुछ खो दिया है । 
प्रतीक्षा करते करते तुझे बहुत दिन बीत गये, तथा बोते बोते तूँने अपने लिये ये विषयवृक्ष ही बो डाले । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - परन्तु तूँ ने उस मनोहर प्रभु परमात्मा का नाम एक क्षण भी नहीं लिया, जब कि तूँने संसार का भार ढोते ढोते अपना समस्त जीवन व्यर्थ बिता दिया ॥९॥ 
(क्रमशः)

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