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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*नारायणा त्रिपोलिया प्रसंग*
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त्रिपोलिया पर भाकरसिंह साखूण वालों ने पू़छा - स्वामिन् ! साधु का लक्षण कहिये ? तब दादूजी ने पद १६४ -
१६४. साधु लक्षण । दीपचन्दी
सद्गति साधवा रे, सन्मुख सिरजनहार ।
भौजल आप तिरैं ते तारैं, प्राण उधारनहार ॥टेक॥
पूरण ब्रह्म राम रंग राते, निर्मल नाम अधार ।
सुख संतोष सदा सत संजम, मति गति वार न पार ॥१॥
जुग जुग राते, जुग जुग माते, जुग जुग संगति सार ।
जुग जुग मेला, जुग जुग जीवन, जुग जुग ज्ञान विचार ॥२॥
सकल शिरोमणि सब सुख दाता, दुर्लभ इहि संसार ।
दादू हंस रहैं सुख सागर, आये पर उपकार ॥३॥
यह सुनकर भाकरसिंह परम प्रसन्न हुये थे ।
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फिर किशनसिंह कैग्यावालों ने पू़छा - स्वामिन् ! संत परब्रह्म को प्राप्त किस साधन से करते हैं ? तब दादूजी ने १६३ का पद...
१६३. साधु साँई हेरे त्रिताल
कोई राम का राता रे, कोई प्रेम का माता रे ॥टेक॥
कोई मन को मारे रे, कोई तन को तारे रे, कोई आप उबारे रे ॥१॥
कोई जोग जुगंता रे, कोई मोक्ष मुकंता रे, कोई है भगवंता रे ॥२॥
कोई सद्गति सारा रे, कोई तारणहारा रे, कोई पीव का प्यारा रे ॥३॥
कोई पार को पाया रे, कोई मिलकर आया रे, कोई मन को भाया रे ॥४॥
कोई है बड़भागी रे, कोई सेज सुहागी रे, कोई है अनुरागी रे ॥५॥
कोई सब सुख दाता रे, कोई रूप विधाता रे, कोई अमृत खाता रे ॥६॥
कोई नूर पिछाणैं रे, कोई तेज कों जाणैं रे, कोई ज्योति बखाणैं रे ॥७॥
कोई साहिब जैसा रे, कोई सांई तैसा रे, कोई दादू ऐसा रे ॥८॥
इस पद से उत्तर दिया था ।
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फिर गिधाणीवाले राघवदास ने पू़छा - स्वामिन् ! भगवद् वचन तथा संत वचनों की क्या विशेषता है ? तब दादूजी ने १६२ का पद कहा -
१६२. निज वचन । महिमा चौताल ध्रुपद में
ऐन बैन चैन होवै, सुणतां सुख लागै रे ।
तीन गुण त्रिविधि तिमिर, भरम करम भागै रे ॥टेक॥
होइ प्रकास अति उजास, परम तत्व सूझै ।
परम सार निर्विकार, विरला कोई बूझै ॥१॥
परम थान सुख निधान, परम शून्य खेलै ।
सहज भाइ सुख समाइ, जीव ब्रह्म मेलै ॥२॥
अगम निगम होइ सुगम, दुस्तर तिर आवै ।
आदि पुरुष दरस परस, दादू सो पावै ॥३॥

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