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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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माता धनकुमारी ने विधि पूर्वक पूजा करके अपने पुत्र जैमल को दादूजी से दीक्षा देने की प्रार्थना की, तब दादूजी ने जैमल को सौंज मंत्र मानस पूजा का उपदेश दिया ।
*सौंज मंत्र* - "सत्यराम, आत्मा वैष्णव, सुबुद्धि भूमि, संतोष स्थान, मूल मंत्र,
मन माला, गुरु तिलक, सत्य संयम, शील शुचिता, ध्यान धोती, काया कलश, प्रेमजल, मनसा मंदिर, निरंजनदेव, आत्मापाती, पुहुप प्रीति, चेतना चन्दन, नवधानाम, भाव पूजा, मति पात्र, सहज समर्पण,शब्द घंटा, आनन्द आरती, दयाप्रसाद, अनन्य एक दशा, तीर्थ सत्संग, दान उपदेश, व्रत स्मरण, षट्गुण ज्ञान, अजपा जाप, अनुभव आचार, मर्यादा राम, फल दर्शन, अभि अन्तर सदा निरंतर, सत्य सौंज दादू बर्तते, आत्मा उपदेश, अंतरगत पूजा ॥"
अर्थ -
*सत्यराम*=निरंजन राम त्रिकाल में एक रस, अबाध होने से सत्य है, इतना वस्तु निर्देश मंगल है । अब पूजा का अधकारी बता रहे हैं -
*आत्मा वैष्णव*=जिसका मन आन्तर आत्मा की ओर ही लगा है, वही पूजा करने वाला वैष्णव है । अर्चना की साधना सामग्री कहते हैं -
*सुबुद्धि भूमि*=स्थिर और निर्मल बुद्धि ही पृथ्वी है ।
*संतोष स्थान*=आशा तृष्णा-लोभ रहित हृदय ही स्थान है ।
*मूल मंत्र*=बीज मंत्र ,'राँ' ही मूलमंत्र है ।
*मनमाला*=भगवत् नामाकार मनके संकल्पों की ही माला है ।
*गुरु तिलक*=गुरु का यथार्थ उपदेश ही तिलक है ।
*सत्य संयम*=तन मन वचन से सत्य का आश्रय लेना ही संयम है ।
*शील सुचिता*=निरंतर ब्रह्मचर्य का धारण करना ही पवित्रता है ।
*ध्यान धोती*= ध्येयाकार वृत्ति ही अधोवस्त्र है ।
*काया कलश*=मनुष्य शरीर ही पूजार्थ जल का कलश है ।
*प्रेम जल*=शुद्ध भगवत् प्रेम ही जल है ।
*मनसा मंदिर*=मन की ब्रह्माकार वृत्ति ही मंदिर है ।
*निरंजन देव*=माया रहित ब्रह्म ही इष्ट देव है ।
*आत्मा पाती*=मन इन्द्रियों को अन्तर्मुख करना ही तुलसीदल है ।
*पुहुप प्रीति*=अनन्य प्रेम ही पुष्प हैं ।
*चेतना चंदन*=चित्त को सावधान रखना चंदन है ।
*नवधा नाम*=इष्टदेव का नाम ही नवधाभक्ति है ।
*भाव पूजा*=उत्कृष्ट श्रद्धा ही पूजा है ।
*मतिपात्र*=ब्रह्म परायण बुद्धि ही पूजा पात्र है ।
*सहज समर्पण*=निर्द्वन्द्वावस्था में स्थति ही समर्पण है ।
*शब्द घन्टा*=अनाहत शब्द "ध्वनि ही घंटा ध्वनि है ।
*आनन्द आरती*=आनन्दानुभव ही आरती है ।
*दया प्रसाद*=आत्मस्वरूप पहचान ने की दया ही प्रसाद है ।
*अनन्य एक दशा*= वृत्ति का अन्य में न जाना, ब्रह्माकार ही रहना एकदशा है ।
*तीर्थ सत्संग*=सत्संग ही तीर्थ है ।
*दान उपदेश*=यथार्थ उपदेश ही दान है ।
*ब्रतस्मरण*=इष्टदेव का स्मरण ही ब्रत है ।
*षट् गुण ज्ञान*=अमान, अदंभ, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, वैराग्य ये ६ गुण ही ज्ञान है ।
*अजपा जाप*=निरंतर चलने वाला 'सोहं' ही अजपा जाप है ।
*अनुभव आचार*=आत्मा का अनुभव ही आचार है ।
*मर्यादा राम*=निरंजन राम को त्याग कर वृत्ति अन्य में न जाना ही मर्यादा है ।
*फल दर्शन*=ब्रह्मात्मा का अभेद दर्शन ही फल है ।
*अभि अन्तर सदा निरंतर, सत्य सौंज दादू बर्तते, आत्मा उपदेश अन्तरगत पूजा*=सच्चे साधक के हृदय में निरंतर सब काल यथार्थ आन्तर अर्चना की यह सामग्री स्थिर रहती है । यही साधक आत्माओं को आन्तर पूजा का उपदेश है ।
(क्रमशः)

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