सोमवार, 8 जून 2015

#‎daduji‬ 
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
२४३. हैरान । राज विद्याधर ताल ~
थकित भयो मन कह्यो न जाई, सहज समाधि रह्यो ल्यौ लाई ॥ टेक ॥ 
जे कुछ कहिये सोच विचारा, ज्ञान अगोचर अगम अपारा ॥ १ ॥ 
साइर बूँद कैसे कर तोलै, आप अबोल कहा कहि बोलै ॥ २ ॥ 
अनल पंखि परै पर दूर, ऐसे राम रह्या भरपूर ॥ ३ ॥ 
अब मन मेरा ऐसे रे भाई, दादू कहबा कहण न जाई ॥ ४ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें परमेश्‍वर सम्बन्धी आश्‍चर्य दिखाते हैं कि हे जिज्ञासुओं ! हमारा मन तो थकित हो रहा है । उस आश्‍चर्य रूप परब्रह्म के स्वरूप को हम क्या कहें ? अब हमारा मन तो सहज कहिए निर्द्वन्द्व होकर सहजावस्था रूप समाधि में अखण्ड़ लय लगा रहा है, जो कुछ सोच विचार कर कहें तो उसका ज्ञान अगम है, मन इन्द्रियों का अविषय । समुद्र की बूँद, समुद्र का थाह कैसे पा सकती है ? क्या कह कर बतला सकती है ? बूँद समुद्र में पड़ते ही समुद्र रूप हो गई, वह कैसे समुद्र का अन्त बता सकती है ? और पक्षी तो बहुत हैं, परन्तु अनल पक्षी तो आकाश में सबसे ऊपर विचरता है, वहाँ कौन जा सकता है ? सौर आकाश का अन्त पा नहीं सकता । वैसे ही राम में सब रहते हैं और राम सबमें परिपूर्ण रूप से व्यापक होने पर भी सबसे दूर हैं, उनका पार कोई भी भक्त नहीं पा सकता । हे भाई ! अब तो हमारे मन की ऐसी अवस्था हो रही है कि वह राम के विषय में कहना चाहता है, परन्तु कुछ कह नहीं पाता है, क्योंकि उसमें अनुभव करने की शक्ति है, कहने की नहीं और वाक् इन्द्रिय में कहने की शक्ति है, अनुभव करने की नहीं । इसलिए ब्रह्म स्वरूप अकथनीय होने से वाणी का विषय नहीं है ।

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