#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
सतगुरु चन्दन बावना, लागे रहैं भुवंग ।
दादू विष छाड़ैं नहीं, कहा करै सत्संग ॥
दादू कीड़ा नरक का, राख्या चंदन मांहि ।
उलट अपूठा नरक में, चन्दन भावै नांहि ॥
कोटि बर्ष लौं राखिये, बंसा चन्दन पास ।
दादू गुण लिये रहै, कदे न लागै बास ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, पत्थर पानी मांहि ।
दादू आडा अंग है, भीतर भेदै नांहि ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, लोहा पारस संग ।
दादू रोम का अन्तरा, पलटै नांही अंग ॥
कोटि वर्ष लौं राखिये, जीव ब्रह्म संग दोइ ।
दादू मांहीं वासना, कदे न मेला होइ ॥
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग !!
होहिँ कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिँ सुलच्छन लोग !!
ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र .. ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार मेँ बुरे और भले पदार्थ बन जाते हैँ, चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैँ !
महाकवि श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है, इस संसार में संगति का अत्यंत प्रभाव है, हम जिस प्रकार की संगति करेंगे हमारी प्रकृति भी सदैव उसी प्रकार की होगी, भले ही कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी क्यों ना हो......
किन्तु यदि उसकी संगति या प्रभाव सम्यक रूपेण किसी अवांछनीय वस्तु के साथ हो जाता है तब उसका जीवनोपयोगी स्वभाब जीव हंता भी हो सकता है !!
संगति सुगति ना पावहि परे कुमति के धन्ध !!
राखो मेल कपूर के हींग ना होय सुगंध !!

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