卐 सत्यराम सा 卐
दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।
कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥२५॥
टीका ~ हे परमेश्वर ! हे परमपिता ! आपकी पूर्ण व्यापक सुरति की हम बलिहारी जाते हैं अर्थात् आप के वारणे जाते हैं ! हे दयालु ! आप कीड़ी से हाथी पर्यन्त सम्पूर्ण प्राणिमात्र का, एक क्षण भर में प्रति - पालना करते हो । इस आपकी समर्थाई को आपके नाम में विश्वास करके, आपका स्मरण करने वाले भक्त ही जानते हैं ॥२५॥
रुकमणी संपुट में धरे, चांवल चींटी लार ।
अश्म - सिता लखि कीट मुख, पृथ्वीराज विचार ॥
अश्म = पत्थर, सिता = शक्कर = पत्थर में पाई जाने वाली शक्कर
दृष्टान्त ~ एक समय रुक्मणी जी को यह शंका हुई कि क्या भगवान् कृष्ण विश्वम्भर हैं ? इनको सारी दुनियां विश्वम्भर नाम से पुकारती है । यह सोचकर भगवान् से प्रश्न किया कि हे नाथ ! क्या आप विश्वंभर हो ? भगवान् बोले ~ ‘‘हाँ, विश्वम्भर तो मैं हूँ ही’’ ।
‘‘क्या सबको आप खाने - पीने को देते हो ?’’ भगवान् ~ हाँ, सभी को देता हूँ, तभी तो नाम विश्वम्भर है । रुक्मणी जी बोली ~ मेरे पास एक जीव है, उसको तो आपने खाने को नहीं दिया ? भगवान् ~ मैंने तो, उसको सबसे पहले दिया है, क्योंकि उसको तो तुमने कैद कर रखा है, देखो उसको ।’’
रुक्मणी जी ने अपने जूड़े में से टीकी लगाने की डिब्बी निकाली, जिसमें उसने चींटी बन्द कर रखी थी । खोल कर देखा तो उसके मुँह में एक चावल की कणी है जो रुक्मणी के माथे से चींटी रखते समय डिब्बी में गिर गई थी । यह देखकर चकित हो गई और नमस्कार किया कि हे नाथ ! आप अवश्य विश्वम्भर ही हो ।
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एक तवो पाषाण को, अग्नि चढ्यो बहु काल ।
कीट तहाँ काँची रहे, रोटी राम दयाल ॥
दृष्टान्त ~ आमेर के राजा पृथ्वीराज किला बनवा रहे थे । मिस्त्रियों ने एक पत्थर का तवा, रोटी बनाने का बना लिया । जब उसको चूल्हे पर रखकर आँच जलाई और उस पर रोटी डाली, तो रोटी चारों तरफ से सिक गई परन्तु बीच में आटा ठंडा रह गया । सभी ने विचार किया, यह क्या कारण है ? रोटी तो बीच में से पहले सिकनी चाहिए ।
यह बात राजा के पास भी पहुँच गई । जब राजा ने अपने सामने उस तवे पर रोटी डलवाई और देखा, तो वैसे ही रोटी बीच में कच्ची दिखाई पड़ी । राजा ने मन में सोचा कि परम्परा से सुनते हैं कि परमेश्वर पत्थर में भी पत्थर - चट्टा कीट को भोजन देता है, जैसी जिसकी खुराक होती है ।
राजा ने उस तवे को मिस्त्री के द्वारा चारों तरफ से छीनी से कटवाया । फिर उसको खुलवाया, तो ढक्कन की तरह खुल गया । उसमें एक कीड़ा देखा । सफेद - सफेद उसके सामने कुछ पड़ा है और वह उसको चाट रहा है । राजा बोले ~ जरा इस सफेद - सफेद को लेकर जीभ से चाखो । चाखने वाला बोला, ‘‘हुजूर ! शक्कर है ।’’ मंत्री को राजा बोले ~ ‘‘आप भी चाखो ।’’ मंत्री बोला ~ ‘‘शक्कर है ।’’
तब तो राजा पृथ्वीराज ने स्वयं भी उंगली लगा कर जबान से चाखा । निश्चय हुआ कि अश्म - पिता पत्थर में पाई जाने वाली शक्कर है । सुनते हैं कि परमेश्वर पत्थर में भी शक्कर - खोर को शक्कर देते हैं । वह यह कीड़ा है । उस परमेश्वर को बारम्बार नमस्कार है, जो सबकी संभाल करता है और सबकी रक्षा करता है । ब्रह्मऋषि कहते हैं कि हम उस परमेश्वर की इस व्यापक सुरति की बार - बार बलिहारी जाते हैं, जो सबकी रक्षा करते हैं और प्रतिपालना करते हैं ।
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विश्वास
दादू छाजन भोजन सहज में, संइयाँ देइ सो लेइ ।
तातैं अधिका और कुछ, सो तूं कांई करेइ ॥२६॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! गुरुमुखी पुरुष अर्थात् गुरु के आज्ञाकारी, जो परमेश्वर ‘छाजन’ कहिए, वस्त्र और भोजन उनको पूरते हैं अर्थात् देते हैं, उसी में सन्तुष्ट रहते हैं । फिर उससे अधिक और परमेश्वर से याचना करके क्या करोगे ? उस प्रभु का विश्वास धारण करके नाम - स्मरण करो, संतोष वृत्ति के द्वारा । परमेश्वर की प्राप्ति होगी ॥२६॥
सीत निवारण कापड़ा, भूख निवारण रोटो ।
अधिको चाहै ‘सन्तदास’, तेही प्राणी खोटो ॥
साहिब इतना दीजिये जामैं कुटुंब समाइ ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाइ ॥
निर्धन घऱ धामो मिल्यो, संतोषी हो साध ।
तातो पानी पी चल्यो, बरस्यो द्रव्य अगाध ॥
दृष्टान्त ~ एक गाँव में संत प्रवचन करते थे । संत बहुत संतोषी और ईश्वर के सच्चे भक्त थे । सभी लोग क्रम - क्रम से अपने घर महाराज को भोजन कराने ले जाते । एक बुढिया माई भी उनके सत्संग में आती थी । उसको भी संतों को घर ले जाने का नम्बर मिला । उस माई के घर संत गये ।
उसने उस रोज गर्म पानी किया था और यह विचार कर रही थी कि आज गर्म पानी पीकर ही भगवान् का भजन करूंगी । उसके घर में खाने - पीने को और कुछ नहीं था । संत आये । उनको नमस्कार किया और बोली ~ महाराज ! मेरे पास तो घर में खाने - पीने को कुछ है नहीं, गर्म पानी बनाया है ।
संत बोले ~ माता, यही हम पी लेंगे । माई ने थाली में गर्म पानी परस दिया । भगवान् के भोग लगाकर, संत पानी पीकर चले गये । परमेश्वर ने माई के यहाँ रात्रि को घर में द्वव्य की वर्षा कर दी । फिर तो माई भगवान् के निमित्त खूब धर्म - पुण्य करने लगी ।
गयो रसायण लेन को, द्विज ज्योतिष परमान ।
भाग बिना पाये नहीं, प्रत्यक्ष लई पिछान ॥
दृष्टान्त ~ एक ब्राह्मण ज्योतिष का पढ़ा हुआ था । एक संत आये । उनको नमस्कार किया और बोला - महाराज ! रसायन बनाने वाली बूंटी आप जानते हो, तो मुझे उसकी पहचान बताओ । महात्मा बोले ~ अमुक दिन, अमुक नक्षत्र में, अमुक वार को, अमुक समय, उस बूंटी को लाना ।
उस बूंटी के नीचे रात्रि को तारे का सा प्रकाश रहता है, उसी से रसायन बनती है । ब्राह्मण ने जैसे महात्मा ने बतलाया था, वैसे ही किया । जब पहाड़ के ऊपर पहुँचा, तो दूर से तारे जैसा प्रकाश दिखलाई दिया, परन्तु उसके पास जावे तो, प्रकाश लोप हो जावे । वापिस ही आ गया । सब वृत्तान्त महात्मा जी को सुनाया । महात्मा बोले ~ तेरे भाग्य में नहीं है ।
जब भोजन वस्त्र परमेश्वर देते हैं, फिर ज्यादा तृष्णा करके क्या करोगे ?
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सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र ~ ॥ विश्वास ॥
जहाँ विश्वास परस्पर नही होगा -
वहाँ क्या होगा ?
वहाँ सेवा नहीं होगी,
वहाँ आग जलेगी, आग ।
प्रेम विश्वास से निकलता है - प्रेम का बाप विश्वास है ।
जहाँ परस्पर विश्वास होगा वहीं प्रेम होगा ।
जो हमसे प्रेम नहीं करता है,
उससे उदासीन होना पड़ता है,
उससे उदासीनता तो स्वाभाविक हो जाती है ।
विश्वास करो । आपमें प्रेम पैदा होगा ।
नारायण स्मृतिः

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