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॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
२३९. निज उपदेश । त्रिताल
सुख दुख संशय दूर किया, तब हम केवल राम लिया ॥ टेक ॥
सुख दुख दोऊ भ्रम बिचारा, इन सौं बंध्या है जग सारा ॥ १ ॥
मेरी मेरा सुख के तांईं, जाइ जन्म नर चेतै नांहीं ॥ २ ॥
सुख के तांई झूठा बोलै, बांधे बंधन कबहूँ न खोलै ॥ ३ ॥
दादू सुख दुख संग न जाई, प्रेम प्रीति पीव सौं ल्यौ लाई ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें, निज अनुभव रूप उपदेश कर रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं! परमेश्वर के सच्चे संत भक्त सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति अप्राप्ति से होने वाले सुख दुःख को मिथ्या जानकर, इस संशय से मुक्त होकर उन्होंने केवल शुद्ध स्वरूप राम का स्मरण ही लिया है । विचार कर देखें तो, सुख दुःख दोनों ही भ्रम रूप हैं । इस सुख दुःख से सारा संसार बँधा हुआ है । सुख में राजी होते हैं, दुःख में रोते हैं ।
अज्ञानी संसारीजन विषय - सुखों के लिये ही कहते हैं कि यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, इसी में अमूल्य मनुष्य जन्म उनका जा रहा है । वे इसको विचार कर नहीं देखते हैं । वे विषय - सुखों के लिये ही रात - दिन झूठ कपट के वचन बोलते रहते हैं । इस प्रकार भूतकाल के कर्म - बन्धन और वर्तमान के कर्म - बन्धन, इनको काटने का कभी निष्काम कर्म का अनुष्ठान नहीं करते हैं । हे अज्ञानीजनों ! यह मायिक सुख दुःख संग में नहीं जावेंगे । प्रेम प्रीति के सहित पीव के नाम - स्मरण में अखंड लय लगाइये ।
“देशकालवशोत्थांन न ममेति मतभ्रमम् ।
शरीरे सुख दुःखानि यः पश्यति सः पश्यति ॥”(योगवाशिष्ठ)
(देशकालवश शरीर में उत्पन्न सुख - दुःख को अपना न मानकर केवल भ्रम समझता है, वही यथार्थ द्रष्टा है ।)

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