गुरुवार, 4 जून 2015

*आमेर नरेश भगवतदास का दर्शनार्थ आना (१)*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*~ त्रयोदश बिंदु ~*
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*आमेर नरेश भगवतदास का दर्शनार्थ आना -*
पुरोहितजी से दादूजी का परिचय प्राप्त होने पर राजा भगवतदास ने कहा - नाम तो मैंने सुना है, और कभी कभी उनके दर्शन की इच्छा भी होती थी किंतु ऐसा अवसर मिला ही नहीं था । अब आपने बताया है कि वे यहां ही पधार गये हैं, यह हम लोगों पर भगवान् की कृपा ही हुई है । भगवान् की कृपा बिना ऐसे संतों के दर्शन कहां प्राप्त होते हैं ? आपने बहुत अच्छा किया जो मुझे दादूजी के आमेर में आने सूचना दी । मैं अब शीघ्र ही उनके दर्शन करने जाऊंगा ।
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फिर राजा को शुभाशीर्वाद देकर पुरोहितजी तो अपने घर को चले गये । इधर राजा ने अपने सेवकों से मेवा, वस्त्र आदि संतों के उपयोग में आने वाली वस्तुयें मँगवाई । फिर कुछ सज्जनों के साथ पृथ्वीराज के पौत्र और भारमल के पुत्र भगवतदास रामबाग में दादूजी के दर्शनार्थ गये ।
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आसन पर विराजे हुये संत प्रवर दादूजी का दूर से दर्शन होते ही राजा के हृदय में आनन्द की लहरी उठने लगी । दादूजी के पास जाकर सेवार्थ लाई गई मेवा, वस्त्रादिक वस्तुयें दादूजी के चरणों में रखवाकर राजा ने ५१ मोहरें अपने हाथ से दादूजी के चरणों में रखकर प्रणाम किया, फिर हाथ जोड़कर सामने बैठ गये ।
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फिर साथ आये हुये एक मंत्री ने महाराजा का परिचय दिया । स्वामीजी महाराज ! आप आमेर के महाराजा भगवतदासजी हैं । राजा होते हुये भी आप ईश्वर भक्त हैं । संतों की सेवा तो आपके कुल परंपरा का काम ही रहा है । आपके पितामह पृथ्वीराज तो प्रसिद्ध महान् भक्त हुये ही हैं । आप भी अच्छे भक्त हैं । फिर दादूजी ने कहा - बहुत अच्छा है, होना ही चाहिये, राजा भक्त होता है, तब राज्य में भी भक्ति का प्रचार होता है ।
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मंत्री की उक्त बात का समर्थन करके फिर दादूजी महाराज ने एक अपने शिष्य की ओर देखते हुये कहा । यह मेवा आदि प्रसाद तो उपस्थित सज्जनों को बाँट दिया जाय, वस्त्र किसी सन्त को आवश्यकता हो तो ले सकते हैं नहीं तो वस्त्र और मोहरें राजा अपने सेवकों के द्वारा गरीबों में बंटवा दें ।
(क्रमशः)

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