卐 सत्यराम सा 卐
दादू आपा गर्ब गुमान तज, मत मत्सर अहंकार ।
गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥
मद मत्सर आपा नहीं, कैसा गर्व गुमान ।
सपनै ही समझै नहीं, दादू क्या अभिमान ॥
झूठा गर्व गुमान तज, तज आपा अभिमान ।
दादू दीन गरीब ह्वै, पाया पद निर्वाण ॥
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सुधि शुक्ला ~ !! श्री गुरुभ्यो नम: !!
(साभार पूज्य स्वामी श्री सर्वज्ञ शंङकरेन्द्र जी)
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“सकल सोकदायक अभिमाना !”
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(भाग- १)
नारायण ! मेरी दादी माँ कहती थीं - "बच्चा, अहङ्कार तो भगवान् का आहार है ।" बचपन में मुझे उतनी समझ - बुझ नहीं थी । मैं दादी अम्बा से कहता - "तब ठाकुर जी को रोज घंटी बजा - बजाकर भोग क्यों लगाती हो ? क्या अहङ्कार खाने से उनका अर्थात् तुम्हारे प्रभु का पेट नहीं भरता ।"
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दादी अम्बा हँसती और कहती - "अरे नहीं रे पगले ! भगवान् का पेट बड़ा भारी है । देखा नहीं तूने । महाभारत में अठारह अक्षौहिणी सेना खा गये तो भी उनका पेट भरा नही, खाली - का - खाली । कभी किसी का पेट भरा है क्या ? खाओ तो लगता है भर गया, जरा हिले - डुले नहीं कि फिर खाली ।"
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मैंने दादी अम्मा को बीच में टोका - "तो क्या दादी माँ, भगवान् दिन - रात खाते रहते हैं ।" "हाँ भाई, हाँ । वे दिनभर खाते - पीते रहते हैं ।" दादी जी बोलीं । मैं तो सोच में पड़ गया । दादी झूठ नहीं बोलतीं । वे भगवान् के पूजा - पाठ में लगी रहती हैं । ठाकुरजी को सुबह - शाम भोग लगाती हैं ।
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हम लोग भी तो सुबह - शाम भोजन करते हैं । यह अलग बात है कि बीच में कुछ चना - चबेना हो जाता है । हाँ, एक बात याद आया । एक बार एक मौसाजी आये थे । वे जब तक रहे, हमेशा कुछ - न - कुछ खाते रहते थे । माँ ने बताया कि मौसा जी को मधुमेह - चिनीया बिमारी है । इसलिये इनका पेट खाली नहीं रहना चाहिये ।
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मैं यह सब सोच ही रहा था कि दादी माँने मुझे टोका - "अरे पगले ! किस उधेड़ - बुन में पड़ गया रे !" मैंने दादी माँ से पूछा - "दादी माँ, भगवान् जी को मधुमेह - चिनिया की बिमारी है क्या ?" दादी माँ जोर से ठट्ठा मारकर हँस पड़ी - "तूँ बहुत शरारती हो गया है । हमारे भगवान् जी कोई मरीज - वरीज नहीं हैं । तूँ, ऐसा कैसे सोच सकता है ?"
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हमने कहा - वो मौसा जी आये थे न ! दिन भर कुछ - न - कुछ खाते रहते थे । हमें माँ ने बताया था कि वे मधुमेह - चीनिया के रोग से ग्रस्त हैं । इसलिये खाली पेट नहीं रहते कुछ - न - कुछ बकरी जैसा खाते रहते हैं ।" मेरी बात सुनकर दादी माँ बोली - धत् कहीं का पगले ! भगवान् तो अपने भक्तों के भले के लिए दिनरात उनका अहंकार खाते रहते हैं । अहङ्कार उनका आहार है । खाते ही पच जाता है और उतना भक्त पतित होने से बच जाता है ।
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अच्छाई से बुराई अधिक होती है । अहङ्कार भी दुनिया में इतना अधिक है कि भगवान् उसे खाते रहते हैं फिर भी खतम होने का नाम नहीं लेता । देखो, किसी को अपने रूप का अहङ्कार है तो किसी को ज्ञान का, किसी को बल का , तो किसी को धन - जन का, किसी को तप की सिद्धि का तो किसी को अपनी प्रसिद्धि अर्थात् यश का, किसी को मान का तो किसी को दान का ।
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अहङ्कार के न जाने कितने रूप हैं । मैं भी सब नहीं जानती । लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि चाहे तिनका हो या भारी भरकम पेड़, सब अग्नि के आहार हैं वैसे ही अभिभान या अहङ्कार चाहे मामूली हो चारे भारी, सब भगवान् के आहार हैं । भगवान् सब देखते रहते हैं, उनसे कुछ भी छिपा नहीं, अहङ्कार अपने आप भगवान् के उदर में जाता रहता है ।"
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नारायण ! दादी माँ आगे बोली - "देख पगले ! मैं तुलसी बाबा जी का रामचरितमानस रोज - रोज बाँचती हूँ न । भगवान् रामजी भी कितना खेल करते हैं -
सबहिं नचावत राम गोसाईं । अपुना रहैं दास की नाई ॥
दास माने नौकर । नौकर को अहङ्कार नहीं होता । होना भी नहीँ चाहिए । बड़ा होने पर, कुछ सज्ञान होनेपर दादी माँ की बातें अब समझ पा रहा हूँ । लोक में एक कहावत है - "घमण्डी का सिर नीचा ।"
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नारायण ! "केनोपनिषद्" में एक बड़ा सुन्दर उपाख्यान आता है । ब्रह्म की सहायता से देवताओं ने दानवों को पराजित किया । अब इन्द्र, अग्नि और वायु को यह अभिमान हुआ कि यह विजय हमने अपने पुरुषार्थ से प्राप्त की है । उसके मन में इसका अहङ्कार आ गया ।
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ब्रह्म ने देखा कि ये तीनों देव तो अभिमान के मद में चूर हो रहे हैं । अतः इनका अभिमान दूर कर इन्हें सन्मार्गपर लाना चाहिए । तब ब्रह्म ने यक्ष का परम तेजोमय रूप धारण किया और जाकर देवों के निकट अवस्थित हो गये । परम तेजस्वी यक्ष को देखकर देवों के मन में उसे जानने की उत्कण्ठा हुई । इन्द्र ने अग्निदेव से कहा कि जाओ और इस यक्ष का परिचय प्राप्त करो ।
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अग्निदेव गये किन्तु उसके समीप पहुँच कर भी उससे कुछ पूछने का साहस न हुआ । तब यक्ष ने ही उनसे पूछा - "आप कौन हैं?" "मैं अग्नि हूँ और मेरे पास इतना सामर्थ्य है कि मैं इस संसार में सब कुछ जला सकता हूँ ।" अग्नि के ऐसा कहनेपर यक्ष ने एक तृण सामने रखकर कहा कि इसे जलाओ । अग्निने अपनी पूरी ताकत लगा दी किन्तु तिनके को न जला सके । सिर नीचा करके वापस चले गये ।
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तब इन्द्र ने वायु से कहा । वायु भी यक्ष के पास गये । यक्ष ने वही प्रश्न वायु से भी किया। वायु ने कहा - "मैं इस संसार की समस्त वस्तुओं को ग्रहण कर सकता हूँ ।" यक्ष ने वायु के समक्ष एक तिनका रखकर कहा - "इसे ग्रहण करो ।" वायु ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी किन्तु तिनके को तनिक भी न हिला सके । वे भी सिर नीचा किये लौट आये ।
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तत्पश्चात् सभी देवताओं ने इन्द्र को प्रेरित किया । इन्द्र के पहुँचते ही वह तेजस्वी यक्ष अन्तर्धान हो गया । इन्द्र तिरस्कृत होकर हतप्रभ हो गये । अग्नि और वायु की ही तरह उन्हें भी अपने "देवेन्द्रत्व" का जो अभिमान था, वह कपूर की तरह उड़ गया । वे चकित खड़े थे, कि वहा हैमवती भगवती उमा प्रकट हुई ।
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इन्द्र द्वारा प्रणति निवेदन करने पर भगवती उमा ने यक्ष का परिचय देते हुए कहा कि ब्रह्म {परमेश्वर} की शक्ति से देवों ने दानवोँ पर विजय प्राप्त की है किन्तु देवगणों को लगा कि यह विजय उन्होंने अपने बलबूते पायी है । इस प्रकार उनमें पैदा हुई अपनी शक्ति के मिथ्याभिमान को दूर करने के लिये ही उस सर्वशक्तिमान् ब्रह्म ने यक्ष का रूप धारण कर आप सबको अहङ्कार त्यागने की शिक्षा दी है ।
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नारायण ! दम्भ, दर्प, अभिमान, अहङ्कार, गर्व या घमण्ड का भाव केवल मनुष्य में ही नहीं अपितु हर योनि के जीवों में रहता है । देवों से लेकर सिद्ध ऋषि मुनि से होता हुआ कृमि - कीटों तक सर्वत्र यह व्याप्त है । वस्तुतः यह आसुर भाव या वृत्ति है । अन्तःकरण में इस वृत्ति के आजानेपर जीव में आसुरी प्रवृत्ति का उदय होता है, जो उसे पतन के मार्ग पर ले जाती है ।
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इसलिये हमारे अतिधन्य सन्त - महात्माओं ने सदैव अहङ्कार से दूर रहने का उपदेश दिया है । अहङ्कार अपने शरीर में स्थित वह कालानाग है जो अपने आश्रय को ही दंश मारता रहता है, अपने विष से व्याकुल किये रहता है । अहंकारी व्यक्ति अपने समक्ष किसी को कुछ भी नहीं गिनता । वह अधम होते हुए भी अपनेको सर्वोत्तम ख्यापित करता है ।
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अहंकार अपने साथ द्वेष और अमर्ष नामक दो बिच्छुओं को भी रख लेता है, जो गाहे - बगाहे डंक मारते रहते हैं । इन नागों बिच्छुओं की दवा है - विनम्रता, श्रद्धा, त्यागभावना और सेवापरायणता । जिन मनुष्यों में ये भाव दृढ़रूप से विद्यमान रहते हैं, उन्हें अहंकार छू भी नहीं सकता और यदि कदाचित् अहङ्कार का बीज कहीं से पड़ा हुआ है तो अङ्कुरित होने के पूर्व ही विनष्ट हो जाता है । इसलिये मनुष्यत्व, ऋषित्व और देवत्व, अहङ्कार रहित्व में ही है ।
सावशेष ......
हे हैमवती भगवती सबका मङ्गल करना ।

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