#daduji
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
.
*प्रीति सी न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और,*
*चित्त सौ न चंदन सनेह सौ न सेहरा ।*
*हृदै सौ न आसन सहज सौ न सिंघासन,*
*भाव सी सौंज और सुंनि सौ न गेहरा ॥*
*शील सौ सनान नांहिं ध्यान सौ न धूप और,*
*ज्ञान सौ न दीपक अज्ञान तम के हरा ।*
*मन सी न माला कोऊ सोऽहं सौ न जाप और,*
*आतमा सौ देव नांहिं देह सौ न देहरा ॥२१॥*१
*उत्तम देवालय* : प्रीति से बढ़ कर कोई पाती(तुलसीदल) नहीं है, प्रेम से बढ़कर कोई फूल नहीं है । चित्त से बढ़कर कोई चन्दन नहीं है तथा स्नेह से बढ़कर कोई आभूषण नहीं ।
हृदय से बढ़कर कोई आसन नहीं, सहज समाधि से बढ़कर कोई सिंहासन नहीं । भाव से बढ़कर कोई पूजा - सामग्री नहीं तथा शून्य चिन्तन से बढ़कर कोई घर नहीं ।
शील से बढ़कर कोई स्नान नहीं, ध्यान से बढ़कर कोई धूप नहीं तथा ज्ञान से बढ़कर कोई दीपक नहीं, जो अज्ञानरूप अन्धकार की निवृत्ति कर सके ।
मन से बढ़कर कोई माला, ‘सोऽहं’ मन्त्र से बढ़कर कोई जाप, आत्मा से बढ़कर कोई देव तथा देव से बढ़कर कोई देवालय नहीं होता ॥२१॥
(१. यह छन्द आगरा वाले कवि बनारसीदास जैन ने श्री सुन्दरदास जी को भेजा था, इसका उत्तर भी श्री सुन्दरदास जी ने छन्द में ही दिया था, जो कि इसी ग्रन्थ में पीछे आ चुका है । द्र० - इसी ग्रन्थ का ‘साधु का अंग’, छ० १५)
(क्रमशः)
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
.
*प्रीति सी न पाती कोऊ प्रेम से न फूल और,*
*चित्त सौ न चंदन सनेह सौ न सेहरा ।*
*हृदै सौ न आसन सहज सौ न सिंघासन,*
*भाव सी सौंज और सुंनि सौ न गेहरा ॥*
*शील सौ सनान नांहिं ध्यान सौ न धूप और,*
*ज्ञान सौ न दीपक अज्ञान तम के हरा ।*
*मन सी न माला कोऊ सोऽहं सौ न जाप और,*
*आतमा सौ देव नांहिं देह सौ न देहरा ॥२१॥*१
*उत्तम देवालय* : प्रीति से बढ़ कर कोई पाती(तुलसीदल) नहीं है, प्रेम से बढ़कर कोई फूल नहीं है । चित्त से बढ़कर कोई चन्दन नहीं है तथा स्नेह से बढ़कर कोई आभूषण नहीं ।
हृदय से बढ़कर कोई आसन नहीं, सहज समाधि से बढ़कर कोई सिंहासन नहीं । भाव से बढ़कर कोई पूजा - सामग्री नहीं तथा शून्य चिन्तन से बढ़कर कोई घर नहीं ।
शील से बढ़कर कोई स्नान नहीं, ध्यान से बढ़कर कोई धूप नहीं तथा ज्ञान से बढ़कर कोई दीपक नहीं, जो अज्ञानरूप अन्धकार की निवृत्ति कर सके ।
मन से बढ़कर कोई माला, ‘सोऽहं’ मन्त्र से बढ़कर कोई जाप, आत्मा से बढ़कर कोई देव तथा देव से बढ़कर कोई देवालय नहीं होता ॥२१॥
(१. यह छन्द आगरा वाले कवि बनारसीदास जैन ने श्री सुन्दरदास जी को भेजा था, इसका उत्तर भी श्री सुन्दरदास जी ने छन्द में ही दिया था, जो कि इसी ग्रन्थ में पीछे आ चुका है । द्र० - इसी ग्रन्थ का ‘साधु का अंग’, छ० १५)
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें