शुक्रवार, 5 जून 2015

#‎daduji‬ 
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
२४०. हैरान । वर्णभिन्न ताल ~ 
कासौं कहूँ हो अगम हरि बाताँ, 
गगन धरणी दिवस नहिं राता ॥ टेक ॥ 
संग न साथी, गुरु नहिं चेला, आसन पास यों रहै अकेला ॥ १ ॥ 
वेद न भेद, न करत विचारा, अवरण वरण सबन तैं न्यारा ॥ २ ॥ 
प्राण न पिंड, रूप नहिं रेखा, सोइ तत्त सार नैन बिन देखा ॥ ३ ॥ 
जोग न भोग, मोह नहिं माया, दादू देख काल नहिं काया ॥ ४ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव इसमें परमेश्‍वर सम्बन्धी आश्‍चर्य दिखा रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! उस अगम मन वाणी का अविषय हरि की भक्ति - ज्ञान रूपी बातें किसको कहें ? उसके स्वरूप में आकाश, धरती, दिन और रात, ये कुछ भी नहीं हैं । वहाँ न कोई संगी साथी है और न चेला और गुरु भाव ही है । वहाँ आशा रूप फाँसी से रहित केवल शुद्ध स्वरूप है । वहाँ वेद का भेद रूप विचार भी नहीं किया जाता । वह वर्ण, काला - गोरा, ब्राह्मण - क्षत्रिय, इन सबसे रहित अवर्ण रूप है । उसमें न प्राण है, न पिंड है । ऐसा रूप, हाथ पर रेखा की भाँति, जीव से दूर नहीं है । वहाँ तत् पद और त्वम् पद का लक्ष्य सार स्वरूप बर्हिमुख नेत्रों के बिना अन्तर्मुख नेत्रों से देखते हैं । वहाँ न योग है, न भोग है, न मोह और माया है । न काया है और न काया का भक्षण करने वाला काल ही है । ऐसे स्वरूप को मुक्तजन अनुभव द्वारा देख रहे हैं ।

- Sant Dadu Dayal 
- English Translation by Pravesh K. Singh 
Whom do I tell about the Inaccessible God, O Brother !
Where neither Sky nor Earth, neither day nor night is there !
There is no friend, no Guru or disciple; no companion is there beside .
Neither Veda, nor thoughts, neither colour or its absence, no distinction of any kind.
Not life, not body, no shape, not even any outline, that Primeval Essence I beheld without eyes.
No Yoga, no enjoyment or suffering, Neither any infatuation nor illusion, I, Dadu, saw Him, beyond any body or even time!

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