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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*~ त्रयोदश बिंदु ~*
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राजा ने दादूजी महाराज की आज्ञानुसार ही सब व्यवस्था करवा दी । फिर दादूजी ने राजा की ओर देखते हुये यह पद बोला -
"डरिये रे डरिये, तातैं राम नाम चित धरिये ॥टेक॥
जिनये पंच पसारे रे, मारे रे ते मारे रे ॥१॥
जिन ये पंच समेटे रे, भेटे रे ते भेटे रे ॥२॥
कच्छप ज्यों कर लिये रे, जीये रे ते जीये रे ॥३॥
भृंगी कीट समाना रे, ध्याना रे यहु ध्याना रे ॥४॥
अजा१ सिंह ज्यों रहिये रे, दादू दर्शन लहिये रे ॥५॥"
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अर्थ: - परमेश्वर से सदा डरते रहकर ही सब कर्म करने चाहिये । वे राम-नाम चिन्तन से ही प्रसन्न होते हैं, इसलिये राम नाम को चित्त में रखना चाहिये । जिन लोगों ने इन पंच ज्ञानेन्द्रियों को विषयों में फैलाया, वे बारम्बार यमदूतों के द्वारा मारे गये और जिन्होंने विषयों में फैले हुये इन पांचों को एकत्र करके प्रभु के स्वरूप में लगाया है, वे प्रतिक्षण प्रभु से मिल रहे हैं ।
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जैसे कछुआ भय से अपने अंगों को अपनी ढाल के नीचे ले आता है, वैसे ही जिन्होंने अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों को आत्म परायण किया है, वे ब्रह्म स्वरूप होकर ही प्रति युग में जीवित रहे हैं । ब्रह्म स्वरूप होने के लिये जैसे कीट भृंगी का ध्यान करता है, वैसे ही ब्रह्म का ध्यान करना चाहिये ।
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यही ध्यान वास्तविक ध्यान है । जैसे दो सिंहों के पिंजरों के बीच बकरी१ बांध दी जाय और उसे खाने-पीने को भी खूब दिया जाय तो भी वह सिंहों के भय से भयभीत रहकर स्थूल नहीं होती है, वैसे ही काल और भगवान् के भय से युक्त होकर जो भजन करता है, वह सांसारिक विषयों से नहीं फूलता है और अन्त में भगवान् का दर्शन करके कृतकृत्य हो जाता है ।
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उक्त उपदेश से राजा को अति आनन्द का अनुभव हुआ । फिर राजा बोला - भगवन् ! आपके दर्शन तथा उपदेश से मुझे परमानन्द प्राप्त हुआ है । आप हम लोगों के भाग्योदय से ही यहां पधारे हैं । मैं आप से प्रार्थना करता हूँ - आप सदा ही यहां विराज कर जीवन पर्यन्त दर्शन तथा अमृतोपम उपदेश करते रहें तो हम लोग आपकी अत्यन्त कृपा ही मानेंगे ।
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दादूजी ने कहा -
"डोरि हरि के हाथ है, गल मांहीं मेरे ।
बाजीगर का बानरा, भावे त्यूं फेरे ॥"
अर्थात् जैसे बाजीगर अपने पालतू वानर को रखता है, वैसे ही वह रहता है, वैसे ही हम को जैसे हरि रखते हैं वैसे ही हम रहते हैं । अतः हम जीवन भर आपके यहाँ रहने की प्रतिज्ञा कैसे कर सकते हैं ? फिर राजा प्रसाद लेकर बोला - भगवन् ! अभी तो मुझे जाने की आज्ञा दीजिये, फिर मैं आऊंगा ऐसा कहकर तथा आज्ञा लेकर प्रणाम किया । फिर राजा भवन को लौट गया और दादूजी से सुने उपदेश को बारंबार मनन करता रहा ।
(क्रमशः)

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