#daduji
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
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*अन्नमय कोष सु तौ पिंड है प्रगट यह,*
*प्रानमय कोष पंच वायु हू बखांनिये ।*
*मनोमय कोष पंच कर्म इन्द्रिय प्रसिद्ध,*
*पंच ज्ञान इन्द्रिय बिज्ञान कोष जांनिये ॥*
*जाग्रत सुपन विषै कहि चत्वार कोष,*
*सुषुपति मांहिं कोष आन्नदमय मांनिये ॥*
*पंच कोष आतमा कौ जीव नांम कहियत,*
*सुन्दर शंकर भाष्य साख्य यह आंनिये ॥२४॥*
शांकर भाष्य के अनुसार सांख्यमत में पाँचकोष होते हैं । जिनमे हमारा यह देह ‘अन्नमय कोष’ कहलाता है । पाँचों प्राणादि वायुओं को ‘प्राणमय कोष’ कहलाते हैं ।
हस्तादि पाँच कर्मेन्द्रियाँ ‘मनोमय कोष’ कहलाती है । तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ ‘विज्ञानकोष’ कहलाती है ।
देह की जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति - ये तीन अवस्थाएँ होती है । इनमे जाग्रत् स्वप्न अवस्थाओं में उपर्युक्त चार कोष होते हैं । तथा सुषुप्ति अवस्था में ‘आनन्दमय कोश’ होता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस पञ्चकोशमय आत्मा का नाम ही ‘जीव’ है यह शान्करभाष्य में लिखा है ॥२४॥
(क्रमशः)

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