#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।
दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥
साचा सतगुरु जे मिलै, सब साज संवारै ।
दादू नाव चढ़ाय कर, ले पार उतारै ॥
सतगुरु पसु मानस करै, मानस थैं सिध सोइ ।
दादू सिध थैं देवता, देव निरंजन होइ ॥
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साभार : राधा शरण दास ~
समुद्र तट पर श्री जनकनन्दिनी के अन्वेषण हेतु सुग्रीव की सेना जमा है, लंका में जाकर खोज करनी है। कौन जावे ? किसकी सामर्थ्य है जो १२०० योजन लंबा समुद्र बिना किसी आधार के पार कर जावे ? सभी सिर झुकाये अपनी असमर्थता और कार्य की असंभवता को लेकर चिंतित हैं किन्तु जाम्बवंत चिंतित नहीं हैं, उन्हें कार्य की सफ़लता में कोई संदेह ही नहीं है और वे श्री हनुमानजी के पास आकर कहते हैं कि "...का चुप साधि रहा बलवाना।" उनके इतना कहते ही श्री हनुमानजी को अपने अतुलित बल-पराक्रम की स्मृति हो आती है कार्य पूर्ण होता है।
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हमारे जीवन में श्रीहरि की कृपा से यही कार्य सदगुरुदेव करते हैं। परमात्मा का अंश होने के कारण उनकी सभी शक्तियाँ, ज्ञान भी हमारे पास है पर संसार में भोग-बुद्धि के कारण हमने अपनी उस स्मृति को किस अंधेरे तहखाने में बंद कर दिया है, हमें यह भी विस्मरण हो जाता है। श्रीहरि की अहैतुकी कृपा के फ़लस्वरुप, जीवन में वह क्षण आता है जब कोई हमें चेताता है कि - "का चुप साधि रहा बलवाना !" पकड़ लेना उसे, वही सदगुरु हैं, वह जो कह दे, स्वीकार कर लेना । उसमें बुद्धि मत लगाना, कौन सा मन्त्र है, कितने अक्षर का है, संस्कृत है या हिन्दी, गुरु का जीवन स्तर कैसा है, उनका कोई शिष्य है या नहीं ?
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अरे भाई ! श्रीहरि ने उन्हें केवल तुम्हारे लिये ही भेजा है अन्यथा इस संसार में कौन किसे चेताता है ! उतार फ़ेको अपने मुखौटे को, अपने वास्तविक स्वरुप को अनुभव करो, तुम्हारे लिये क्या असंभव है, जीव तो प्रभु का नित्य दास है ही। भरो हुंकार ! प्रभु को प्रणाम करो ! उनका कार्य करना है जिससे हमारा ही कल्याण होगा। श्रीहरि और सदगुरु खोजने से नहीं मिलते क्योंकि वह साधन साध्य नहीं, कृपा-साध्य हैं।
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बस, अपने भीतर की प्यास जगी रहे, अधूरापन अनुभव होता रहे, आत्मा की सुनते रहें तो श्रीहरि और सदगुरुदेव तो इन्हीं क्षणों की प्रतीक्षा में हैं, उन्हें तो प्रकट होना ही है।
जय जय श्री राधे !

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