शनिवार, 19 सितंबर 2015

= १७९ =

#daduji
卐 सत्यराम 卐
जहँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार ।
अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥
भाव भक्ति लै ऊपजै, सो ठाहर निज सार ।
तहँ दादू निधि पाइये, निरंतर निरधार ॥
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साभार : Ramjibhai Jotaniya ~
प्रिय मित्रों शुभ प्रभात।
मित्रों वैसे तो शब्द एक ही हो सकता है परन्तु ध्वनी अनेक होने के कारण हमारे बुजुर्गों ने शोध करके पञ्च शब्दों का नाम देकर समझाने का प्रयास किया है उन्हीं शब्दों के विज्ञान को मैं यहाँ बता रहा हूँ....
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जैसे झरना उपर से गिरता है तो मैदान में आते आते नाना ध्वनियों में बदल जाता है वैसे ही शब्द ब्रह्म की नाना ध्वनी बन जाती हैं। हमारा प्राण ही जल के झरने की तरह होता है इसलिए इसी में नाना ध्वनियाँ बनती हैं। स्वास में पहली ध्वनी जो योगियों ने पकड़ी वो है सोहं जिसे *अगोचरी* मुद्रा के द्वारा बोधगम्य किया जा सकता है।
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सोहं शब्द को पकड कर साधक जब तल्लीन हो जाता है तो सो अर्थात सकार और हकार शांत हो जाते है और ओम की ध्वनी बच जाती है जिसे *भूचरी* मुद्रा के द्वारा बोधगम्य किया जा सकता है। साधक जब ओम में तल्लीन हो जाता है तो ओ और म भी शांत हो जाता है और केवल रंकार बच जाता है जिसे *खेचरी* मुद्रा द्वारा बोधगम्य किया जा सकता है।
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रंकार में तल्लीन होने पर प्रकृति की अवस्था समझ में आती है जिसमें योनि मुद्रा लगाकर स्थित हुआ जा सकता है। प्रकृति से परे का शब्द निरंजन आता है जिसको चाचरी मुद्रा से बोधगम्य किया जा सकता है। निरंजन अर्थात निर+अंजन यानि माया से रहित अवस्था इस अवस्था को ही सिद्धों ने सहज अवस्था, भावातीत अवस्था, परम अवस्था आदि नाना नाम देकर समझाया है।
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उसी अवस्था को कुछ साधना पंथों में अनाम देश बताया है तो कुछ ने अक्षर ब्रह्म बताया है। इसी अवस्था में तुलसी की कही हुई बात नाम रूप दुई ईश् उपाधि वाली बात समझ में आती है। इसी को ज्ञान का प्रकश बताया गया है और यही सतगुरु की प्राप्ति की अवस्था होती है।

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