शनिवार, 19 सितंबर 2015

२९. ज्ञानी को अंग ~ १६

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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*सुपनै मैं राजा होइ सुपनै मैं रंक होइ,*
*सुपनै मैं सुख दुख सति करि जांनै है ।*
*सुपनै मैं बुद्धिहीन मूढ़ समझै न कछु,*
*सुपनै मैं पंडित बहु ग्रंथनि बखांनै है ॥*
*सुपनै मैं कांमी होइ इंद्रनि कै बसि पर्यौ,*
*सुपनै मैं जती होइ अहंकार आंनै है ।*
*सुपनै तैं जाग्यौ सब समुझि परी है तब,*
*सुन्दर कहत सब मिथ्या करि मांनै है ॥१६॥*
कोई मूर्ख स्वप्न में राजा हो जाता है, कोई निर्धन । वह स्वप्नों के सुख दुःख को सत्य मान बैठता है ।
स्वप्न में उसकी बुद्धि अकचका जाती है तथा कभी किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है, कभी विविध शास्त्रज्ञ एवं पण्डित बन जाता है तथा बहुत से ग्रन्थों का रचियता बन जाता है ।
स्वप्न में कभी कामी बनकर इन्द्रियों के आधीन हो जाता है तथा कभी यति होने का अभिमान करने लगता है ।
जब वह स्वप्नावस्था से पुनः जाग्रदवस्था में पहुँचता है तब उस को अपनी वास्तविक स्थिति का ध्यान आता है । *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - उस अवस्था में वह स्वप्न में देखी हुई सभी बातों को मिथ्या मान लेता है ॥१६॥
(क्रमशः)

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