#daduji
卐 सत्यराम 卐
दादू जे तूं जोगी गुरुमुखी, तो लेना तत्त्व विचार ।
गह आयुध गुरु ज्ञान का, काल पुरुष को मार ॥
नाद बिंदु सौं घट भरै, सो जोगी जीवै ।
दादू काहे को मरै, राम रस पीवै ॥
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साभार : Pannalal Ranga ~
*ब्रह्मचर्य का महत्व*
जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। (भोजन से रस बनने में ५ दिन लगते हैं) पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है। पाँच दिन बाद रक्त से मांस, उसमें से ५ - ५ दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है। स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे 'रज' कहते हैं। इस प्रकार वीर्य बनने में करीब ३०दिन व ४ घण्टे लग जाते हैं।
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वैज्ञानिक बताते हैं कि ३२ किलो भोजन से ८०० ग्राम रक्त बनता है. और ८०० ग्राम रक्त से लगभग २० ग्राम वीर्य बनता है। वीर्य के संयम से शरीर में अदभुत आकर्षक शक्ति उत्पन्न होती है, जिसे प्राचीन वैद्य धन्वंतरि ने 'ओज' कहा है। यही ओज मनुष्य को परम लाभ-आत्मदर्शन कराने में सहायक बनता है। आप जहाँ-जहाँ भी किसी के जीवन में कुछ विशेषता, चेहरे पर तेज, वाणी में बल, कार्य में उत्साह पायेंगे, वहाँ समझो वीर्यरक्षण का ही चमत्कार है।
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परमात्मा द्वारा अपनी सारी शक्ति बीज रुप में मनुष्य को दी गई है। वह शक्ति कुण्डलिनी कहलाती है। आधुनिक परमाणु विज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी(अटॉमिक रिएक्टर) है | मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी महाशक्ति अत्यन्त प्रचण्ड स्तर की क्षमताएँ दबाए बैठी है। पुराणों में इसे महाकाली के नाम से पुकारा गया है।
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कामशक्ति का अनुपयोग, सदुपयोग, दुरुपयोग किस प्रकार मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है, उसे आध्यात्मिक काम विज्ञान कहना चाहिए। इस शक्ति का बहुत सूझ-बूझ के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए, यही ब्रह्मचर्य का तत्व ज्ञान है। बिजली की शक्ति से अगणित प्रयोजन पूरे किए जाते हैं और लाभ उठाए जाते हैं, पर यह तभी होता है जब उसका ठीक तरह प्रयोग करना आए, अन्यथा चूक करने वाले के लिए तो वही बिजली प्राणघातक सिद्ध होती है।
नमन

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