॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३४२. गजताल ~
सोई राम सँभाल जियरा, प्राण पिंड जिन दीन्हा रे ।
अम्बर आप उपावनहारा, मांहि चित्र जिन कीन्हा रे ॥ टेक ॥
चंद सूर जिन किये चिराका, चरणों बिना चलावै रे ।
इक शीतल इक तारा डोलै, अनन्त कला दिखलावै रे ॥ १ ॥
धरती धरनि वरन बहु वाणी, रचिले सप्त समंदा रे ।
जल थल जीव सँभालनहारा, पूर रह्या सब संगा रे ॥ २ ॥
प्रकट पवन पानी जिन कीन्हा, वरषावै बहु धारा रे ।
अठारह भार वृक्ष बहु विधि के, सबका सींचनहारा रे ॥ ३ ॥
पँच तत्व जिन किये पसारा, सब करि देखन लागा रे ।
निश्चल राम जपो मेरे जियरा, दादू तातैं जागा रे ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव परमेश्वर का विश्वासपूर्वक भजन करने की प्रेरणा कर रहे हैं कि हे हमारे जीव ! उसी समर्थ राम का नाम स्मरण कर, जिसने तेरे को मनुष्य देह रूपी शरीर में प्राण दिये हैं । उस आप स्वयं समर्थ ने, आकाश रूपी मन्दिर रचकर, इसमें नाना प्रकार के तारा रूप चित्राम कैसे बनाये हैं और चन्द्रमा - सूर्य रूप दो चिराग बनाए हैं । इनको चरणों के बिना ही चला रहे हैं । एक शीतल और एक गर्म, दोनों चिराग घूमने वाले बनाये हैं और फिऱ उनमें अनन्त कला दिखलाई हैं । उसी समर्थ ने इस पृथ्वी को रच करके धारण की है और बहुत प्रकार के प्राणी और उनकी भिन्न - भिन्न वाणी वा बोलियाँ रची हैं । और उसी परमेश्वर ने सातों समुद्र रच लिये हैं । फिर जल में थल में कहिए, पृथ्वी पर जितने भी जीव बसते हैं, उन सबकी संभाल करता है और सब प्राणियों के साथ पूर्ण रूप से व्यापक हो रहे हैं ।
उस समर्थ ने ही यह पवन और पानी प्रकट रूप में रचा है और अनन्त धाराओं से पृथ्वी पर पानी बरसा रहा है । फिर वह समर्थ अठारह भार, बहुत प्रकार के वृक्षों, को जंगल में सींच रहे हैं । पँच महा भूतों का यह सारा पसारा फैलाकर आप ही इसमें द्रष्टा रूप से देख रहे हैं । हे हमारे जीव ! ऐसा जो समर्थ निश्चल राम है, उसी को तूँ जप, तब तूँ समझना कि आज मैं अज्ञानता से जाग उठा हूँ ।

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