शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

= १९० =

#daduji
卐 सत्यराम 卐
दादू आप चिणावै देहुरा, तिसका करहि जतन ।
प्रत्यक्ष परमेश्वर किया, सो भानै जीव रतन ॥
===================
साभार : Ramgopal Goyal ~
"चौदहवीं शताब्दी में आंध्र प्रदेश की शूद्र जाति में जन्मे संत "श्री वेमना जी" के मूर्ति पूजाके प्रति भाव"
कुछ लोग भी कैसे पशु हैं कि, पत्थरों को तो पूजते हैं, लेकिन अंतर के अंतर्यामी सच्चिदानंद भगवान की परवाह ही नहीं। एक निर्जीव पत्थर कैसे जीती जागती व नित्य ईश्वरीय शक्ति से बढ कर हो सकता है। उन्होंने न जाने कैसी कैसी भ्रांतियां पाल रखी हैं कि, भगवान निर्जीव मूर्तियों में तो बसते हैं, लेकिन मुझ चलते फिरते इंसान में नहीं।
.
एक पत्थर के टुकडे को किसी पहाड की चोटी से हाथ पैरों से लुढका कर पटकते हुए ले आते हैं, फिर छैनी से काटते हैं, हथौडे से पीटते हैं और उसके सामने काँपते हुए से मंत्र जपते हैं, और सालों जपते ही रहते हैं। वे मूर्ख जीवित बैल को तो मारते हैं, भूखा रखते हैं, लेकिन जब वह पत्थर में ढल जाता है, तो उसकी पूजा करने लगते हैं, मिठाईयाँ खिलाने लगते हैं। यह कितना बडा धोखा है। क्या ? उनने मान लिया है कि, भगवान घट - घट बासी नहीं है, वह केवल पत्थरों में ही रहता है।
.
आज के सन्दर्भ में देखते हैं ~ गणेश पूजा का चतुर्दिश उत्सव, अपनी अपनी भावनानुसार श्री गणेश जी की प्रतिमा लाना, पूजा उत्सव प्रसाद आदि से आनन्द मानना और उन्हें विसर्जन करना !!! फिर चाहे हमारी पूजित प्रतिमा खंड खंड होकर कीचड में या नालों में रौंदी जाय ?? हमें तो कुछ दिनकी स्वार्थ लोलुप पूजा से अपनी मन्नत पूरी करनी है, अटके कार्य सिद्ध करने हैं, श्रद्धा और विश्वास की तो परिभाषा ही उलट गयी है ........
फल कारण सेवा करे, याचे त्रिभुवनराव ।
दादू सो सेवक नहीं, खेले अपना दाव ॥

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें