शनिवार, 26 सितंबर 2015


💐💐 ‪#‎daduji‬ 💐💐
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३४९. समता ज्ञान । त्रिताल ~
इन बातनि मेरा मन मानै ।
दुतिया दोइ नहीं उर अंतर, एक एक कर पीव कौं जानै ॥ टेक ॥
पूर्ण ब्रह्म देखै सबहिन में, भ्रम न जीव काहू तैं आनै ।
होइ दयालु दीनता सब सौं, अरि पाँचनि को करै किसानै ॥ १ ॥ 
आपा पर सम सब तत चीन्हैं, हरि भजै केवल जस गानै ।
दादू सोई सहज घर आनै, संकट सबै जीव के भानै ॥ २ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव समता ज्ञान की विशेषता बता रहे हैं कि हे जिज्ञासु ! इन निम्न बातों से हमारा मन मानता है अर्थात् संतोष को प्राप्त होता है, और हृदय में “मैं - तूँ” यह भेद - ज्ञान नहीं रहता । मुख - प्रीति का विषय एक पीव को ही जानता है और उसी पूर्ण ब्रह्म को सबमें व्यापक रूप से देखता है । किसी भी जीव से भेद - भाव नहीं रखता और जिसके अन्तःकरण से पाँचों प्रकाऱ का भ्रम नष्ट हो गया है । प्राणी मात्र के ऊपर दयालु रहता है । 
उत्तम पुरुष एवं संतों के सामने दीनता को धारण करता है । काम, क्रोध आदि शत्रु तथा पँच ज्ञान इन्द्रियाँ, इन सबके विषय - विकारों को त्यागता है । अपने और पराये में समता ज्ञान से एक चेतन तत्व को ही जानता है । पापों के हर्ता हरि का भजन रूप यश गाता रहता है । ऐसा पुरुष स्वभाव से ही अपने जीव को हृदय - प्रदेश में परब्रह्म रूप घर में स्थित करके अपने जन्म - मरण आदि क्लेशों को नष्ट कर देता है

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