रविवार, 20 सितंबर 2015

 

💐💐 #‎daduji 💐💐
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३४३. परिचय । गज ताल ~
जब मैं रहते की रह जानी । 
काल काया के निकट न आवै, पावत है सुख प्राणी ॥ टेक ॥ 
शोक संताप नैन नहिं देखूं, राग द्वेष नहिं आवै । 
जागत है जासौं रुचि मेरी, स्वप्नै सोइ दिखावै ॥ १ ॥ 
भरम कर्म मोह नहिं ममता, वाद विवाद न जानूं । 
मोहन सौं मेरी बन आई, रसना सोई बखानूं ॥ २ ॥ 
निशिवासर मोहन तन मेरे, चरण कँवल मन जानै । 
निधि निरख देख सचु पाऊँ, दादू और न जानै ॥ ३ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव परिचय साक्षात्कार से लाभ दिखा रहे हैं कि हे संतों ! जब से हमने माया और माया का कार्य से रहित, एक अद्वैत परब्रह्म प्राप्ति का ज्ञान रूप रहस्य जाना है, तब से काल, जो सम्पूर्ण संसार का भक्षण करने वाला है, वह हमारी काया के नजदीक भी नहीं आता और प्राण ब्रह्मानन्द रूप सुख को प्राप्त हो रहे हैं, शोक जन्य संताप, दुःख तो हम देखते ही नहीं और राग - द्वेष भी अब हमारे अन्तःकरण में नही प्रकट होते । जाग्रत अवस्था में जिस सत्य - स्वरूप में मेरी प्रीति है, स्वप्न में भी मुझे परमात्मा वही अपना स्वरूप दिखाते हैं । 
अब पाँच प्रकार का भ्रम और सम्पूर्ण सकाम कर्म, ममता - मोह, वाद(शास्त्र के अनुसार) और विवाद(शास्त्र से विरूद्ध) ये कोई भी अब हमारे अन्तःकरण में नही भान होते हैं । विश्‍व - विमोहन परमेश्‍वर से अब हमारी प्रीति अखण्ड लग गई है । जिह्वा से भी हम उन्हीं का नाम - स्मरण करते हैं । मेरे हृदय - प्रदेश में रात - दिन परमेश्‍वर विशेष रूप से विराजते हैं । उनके तेज - पुंज रूप चरणों में ही अब हमारा मन स्थिर हो रहा है । तत्ववेत्ता पुरुष कहते हैं कि हमने उसी परब्रह्म रूप निधि को निज आत्म - स्वरूप से ज्ञान रूप नेत्रों द्वारा देख करके सत्य - स्वरूप को प्राप्त किया है । उसके सिवाय अब माया और माया के कार्य को सत्य रूप करके नहीं जानते

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