रविवार, 20 सितंबर 2015

*= राजान्न से विघ्न =*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २१ वां विन्दु सीकरी सत्संग दिन ३ =*
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*= राजान्न से विघ्न =*
बीरबल द्वारा दादूजी के राजान्न भोजन न स्वीकार करने की बात सुनकर बादशाह को कुछ बुरा लगा । फिर अवसर देखकर तुलसी ब्राह्मण ने अकबर बादशाह को
कहा - वास्तव में राजान्न की बात नहीं है । दादू आपको मुसलमान समझकर आपका अन्न नहीं खा रहे हैं । राजा भगवत् - दास का भी तो खाते हैं ।
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तब तो अकबर को और भी बुरा लगा । इससे बादशाह कुछ कुपित होकर बोला - ऐसा यह संत कहां से आया है । जो हमारा अन्न नहीं खाना चाहता । हमारा अन्न नहीं खायगा तो वह किसके देश में रहेगा ? ऐसा बोलकर बीरबल को कहा - आज जब उनका साधु भिक्षा लेने जाय तब नगर के द्वार बन्द करा दिये जायें । द्वारपालों को मेरी यह आज्ञा सुना दी जाय । वे द्वार बन्द करदें ।
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पीर, पैगम्बर, बादशाह सभी अन्न के बिना जीवित नहीं रह सकते, अन्न खाये बिना तो किसी का भी शरीर नहीं रह सकता । ऐसा करने पर राजान्न नहीं खायेंगे तो क्या खायेंगे ? फिर तो भूखों मरते आपही राजान्न खायेंगे । बादशाह की आज्ञा द्वारपालों को सुनादी गई । उन्होंने भिक्षा लाने के समय द्वार बन्द कर दिये ।
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*जग्गाजी का कोट की दीवार लांघना -*
सोई जनगोपालजी ने कहा -
"जब जग्गो भिक्षा कर लायो, आगे किलो जड़ो तब पायो ।
हेले दिये जवाब न दीयो, तब अवधूत अचम्भो कियो ॥२६॥
जग्गे दीर्घ शरीर बधायो, डग भर किलो डाँक चल आयो ।
फक्कर अजमत अजब दिखाई, लख दरवान दहैसत खाई ॥२७॥"
(विश्राम ६)
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जग्गाजी भिक्षा लेकर आये तो द्वार बन्द मिला उन्होंने द्वारपालों को आवाजें दी किन्तु वे कैसे बोलते । उन्हें तो बादशाह की यही थी कि द्वार बन्द करके साधु को रोकलो ।" जग्गा कुछ देर खड़े रहे फिर उन्होंने ध्यान करके देखा तो अपनी योग शक्ति से सम्पूर्ण षड़यन्त्र जान लिया ।
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फिर तो वे वामन् भगवान् के समान सहसा अपने शरीर को बढ़ाकर दीवार को लाँघ गये । जग्गाजी की यह अद्भुत करामात देखकर द्वारपाल डर गया और भय के मारे सहसा पृथ्वी पर गिर गया, फिर सचेत होकर अपने अफसर के पास जाकर उक्त घटना सुनाई ।
(क्रमशः)


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